बुधवार, 20 जनवरी 2016

मेरी बात

हिन्दी की प्रसिद्‌ध लेखिका हैं शिवानी, उनकी एक कहानी आई०एस०सी० हिन्दी के नए पाठ्यक्रम में शामिल की गई है - सती। जिसमें एक स्त्री है मदालसा जो मूलत: एक ठग है और ट्रेन की एक बोगी में यात्रा कर रही तीन महिलाओं को अपने मृत पति की चिता पर बैठकर सती होने की खानदानी परम्परा की  झूठी कहानी सुनाकर भावुक कर देती है और नशीला खाना खिलाकर ठग लेती है जिसमें लेखिका भी एक किरदार के रूप में मौजूद है। कहानी की कथावस्तु का विस्तार लगभग इतना ही है और कक्षा में पढ़ाते वक्त ज़्यादा समय भी नहीं लगता। मैंने भी कहानी अपनी कक्षा में सुनाई और विद्‌यार्थियों से प्रतिक्रिया माँगी। पूरी कक्षा दो हिस्सों में बँट गई और लड़कों ने कहा कि स्त्रियाँ ज़्यादा भावुक होती हैं इसलिए सहजता से  भावनात्मक मूर्ख बन जाती हैं। लड़कियों ने कहा कि हमें ज़्यादा भावुक नहीं होना चाहिए बल्कि हममें व्यावहारिकता की मात्रा ज़्यादा होनी चाहिए। पर मैं अपने विद्‌यार्थियों से सहमत नहीं हो पाया। मैंने उनसे पूछा कि भावुकता इनसान का गुण है या दुर्गुण? छात्रों ने सधा हुआ सा जवाब दिया कि यदि भावुकता निश्चित सीमा में है तो गुण अन्यथा दुर्गुण।
मैंने एकबार फिर अपनी असहमति ज़ाहिर की पर इस बार मुझे कोई जवाब नहीं मिला। तब मैंने पूरी कक्षा को हैदराबाद विश्वविद्‌यालय के छात्र रोहित वेमुला की वह चिट्‌ठी पढ़कर सुनाई जिसे उसने आत्महत्या करने से पहले लिखा था जिसका अनुवाद सोशल मिडिया पर भरत तिवारी ने किया है -
 
गुड मॉर्निंग,
जब आप यह पत्र पढ़ रहे होंगे तब मैं यहाँ नहीं होऊँगा। मुझसे नाराज़ नहीं होना। मुझे मालूम है कि आप में से कुछ लोग सच में मेरी परवाह करते थे, मुझे प्यार करते थे और बहुत अच्छा व्यवहार करते थे। मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। मुझे तो हमेशा ख़ुद से ही दिक्कत होती थी। मुझे अपनी आत्मा और शरीर के बीच बढ़ती दूरी महसूस हो रही है। और मैं एक क्रूर-इन्सान (मॉन्स्टर) बन गया हूँ। मैं हमेशा से ही एक लेखक बनना चाहता था। कार्ल सगन की तरह विज्ञान का एक लेखक। और अंत में यही एक पत्र है – जो मुझे लिखने को मिला।
मैं विज्ञान, सितारों और प्रकृति से प्यार करता था और साथ ही मैं इंसानों से भी प्यार करता था - यह जानने के बावजूद कि इंसान अब प्रकृति से अलग हो गया है। हमारी भावनाएँ अब हमारी नहीं रहीं। हमारा प्यार कृत्रिम हो गया। हमारे विश्वास, दिखावा। कृत्रिम-कला, हमारी असलियत की पहचान। बगैर आहत हुए प्यार करना बहुत मुश्किल हो गया है।
इंसान की कीमत बस उसकी फौरी-पहचान और निकटतम संभावना बन के रह गयी है। एक वोट। एक गिनती। एक चीज़। इंसान को एक दिमाग की तरह देखा ही नहीं गया। सितारों के कणों का एक शानदार सृजन। पढाई में, गलियों में, राजनीति में, मरने में, जिंदा रहने में, हर जगह।
मैं ऐसा ख़त पहली दफ़ा लिख रहा हूँ। पहली बार एक अंतिम चिट्‌ठी। अगर यह बेतुका हो तो मुझे माफ कर देना। हो सकता है दुनिया को समझने में मैं शुरू से ही गलत रहा होऊँ। प्यार, पीड़ा, ज़िन्दगी, मौत को समझने में गलत रहा होऊँ। कोई जल्दी भी तो नहीं थी। लेकिन मैं हमेशा जल्दी में रहा। जीवन शुरू करने को बेताब। इस सब के बीच कुछ लोगों के लिए जीवन ही अभिशाप है। मेरा जन्म एक बड़ी दुर्घटना है। मैं बचपन के अकेलेपन से कभी बाहर नहीं आ सका। अतीत का वह उपेक्षित बच्चा।
मुझे इस वक़्त कोई आघात नहीं है। मैं दुखी नहीं हूँ। मैं एक शून्य हो गया हूँ। अपने से बेपरवाह। यह दयनीय है। और इसीलिए मैं यह कर रहा हूँ।
मेरे जाने के बाद लोग मुझे कायर कह सकते हैं। या स्वार्थी या बेवकूफ। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई मुझे क्या कहता है। मृत्यु के बाद की कहानियों, भूत, या आत्माओं इन सबमे मैं विश्वास नहीं करता। अगर मैं किसी चीज में भरोसा करता हूँ तो - मैं सितारों का सफ़र कर सकता हूँ अपने इस विश्वास में। और दूसरी दुनियाओं को जानूँ।
अगर आप, जो यह पत्र पढ़ रहे है, मेरे लिए कुछ कर सकते हैं, मुझे अपनी सात महीने की फ़ेलोशिप मिलनी है, एक लाख पचहत्तर हज़ार रुपये। कृपया देखिएगा कि यह मेरे परिवार को मिल जाये। मुझे चालीस हज़ार रुपये रामजी को देने हैं। उन्होंने ये पैसे कभी वापस माँगे ही नहीं। लेकिन कृपया उन्हें इन पैसों में से ये वापस दे दीजियेगा।
मेरे अंतिम संस्कार को शांत रहने दीजियेगा। ऐसा सोचियेगा कि मैं बस दिखा और चला गया। मेरे लिए आँसू नहींबहाइएगा। यह बात समझिएगा कि मैं जिंदा रहने से ज्यादा मर कर खुश हूँ।
‘परछाइयों से सितारों तक’
उमा अन्ना, माफ़ कीजियेगा - इस काम के लिए आपका कमरा यूज़ किया।
एएसए [अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन] परिवार, आप सब को निराश करने के लिए माफ़ी। आपने मुझे बहुत प्यार किया। अच्छे भविष्य के लिए मेरी शुभकामनाएं।
एक आखिरी बार के लिए,
जय भीम
मैं औपचारिकताओं को लिखना भूल गया।
अपने आप को मारने के मेरे इस कृत्य के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है।
यह करने के लिए किसी ने मुझे उकसाया नहीं है, न अपने कृत्य से, न अपने शब्दों से।
यह मेरा निर्णय है और अकेला मैं ही इसके लिए ज़िम्मेदार हूँ।
मेरे दोस्तों और मेरे दुश्मनों को मेरे जाने के बाद इसके लिए परेशान न कीजियेगा।
 
इस बार मैंने फिर अपने विद्‌यार्थियों से एक प्रश्न पूछा - "क्या रोहित का आत्महत्या करना भावुकता में उठाया हुआ कमज़ोर कदम था?
यकीन मानिए इस बार पूरी कक्षा में देर तक खामोशी पसरी रही और ये खामोशी भावुकता की बिल्कुल नहीं थी...कक्षा के खत्म होने का घंटा बज चुका था और मैं अपनी किताबों को समेटे स्टाफ रूम की ओर चल पड़ा।
ज़हन में एक बात घूम रही थी कि भावुकता इनसान के बहुत सारे अच्छे गुणों में से एक है फिर वह दुर्गुण कैसे बन सकता है या कैसे कोई भावुक होकर ठगा जा सकता है? भावुक होना इनसान की कमज़ोरी कैसे बन सकती है और व्यावहारिकता चालाकी या धूर्तता का पर्याय क्यों मान लिया गया है। क्या हमने एक ऐसे माहौल का निर्माण कर लिया है जहाँ इनसान का भावुक होना, दुखी होना या रोना उसकी कमज़ोरी मान ली गई है...

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