साहित्य सागर - गद्‌य

दो कलाकार
मन्नू भंडारी


(जन्म- 3 अप्रैल 1931)

मन्नू भंडारी  हिन्दी की सुप्रसिद्‌ध कहानीकार हैं। मध्य प्रदेश में मंदसौर जिले के भानपुरा गाँव में जन्मी मन्नू का बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था। लेखन के लिए उन्होंने मन्नू नाम का चुनाव किया। उन्होंने एम० ए० तक शिक्षा पाई और वर्षों तक दिल्ली के मीरांडा हाउस में अध्यापिका रहीं। धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित उपन्यास आपका बंटी से लोकप्रियता प्राप्त करने वाली मन्नू भंडारी विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की अध्यक्षा भी रहीं। लेखन का संस्कार उन्हें विरासत में मिला। उनके पिता सुख सम्पतराय भी जाने माने लेखक थे।
मन्नू भंडारी ने कहानियां और उपन्यास दोनों लिखे हैं। एक प्लेट सैलाब' (१९६२), `मैं हार गई' (१९५७), `तीन निगाहों की एक तस्वीर', `यही सच है'(१९६६), `त्रिशंकु' और `आँखों देखा झूठ' उनके महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। विवाह विच्छेद की त्रासदी में पिस रहे एक बच्चे को केंद्र में रखकर लिखा गया उनका उपन्यास `आपका बंटी' (१९७१) हिन्दी के सफलतम उपन्यासों में गिना जाता है। मन्नू भंडारी हिन्दी की लोकप्रिय कथाकारों में से हैं। इसी प्रकार 'यही सच है' पर आधारित 'रजनीगंधा' नामक फिल्म अत्यंत लोकप्रिय हुई थी । इसके अतिरिक्त उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली का शिखर सम्मान, बिहार सरकार, भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, व्यास सम्मान और उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत।

प्रमुख रचनाएँ -
कहानी-संग्रह :- एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की एक तस्वीर, यही सच है, त्रिशंकु, श्रेष्ठ कहानियाँ, आँखों देखा झूठ, नायक खलनायक विदूषक।
उपन्यास :- आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, एक इंच मुस्कान और कलवा,
एक कहानी यह भी
पटकथाएँ :- रजनी, निर्मला, स्वामी, दर्पण।
नाटक :- बिना दीवारों का घर।



                                                       (दो कलाकार - दूरदर्शन के सौजन्य से)
 कठिन शब्दार्थ
गलतफ़हमी - गलत समझ लेना
प्रतीक - चिह्‌न
ढिंढोरा पीटना - सबसे कहते फिरना
नवाबी चलाना - अधिकार जताना
रोब खाना - दबना
हाड़ तोड़कर परिश्रम करना - कड़ी मेहनत करना
तूली - कूँची ( Brush)
शोहरत - प्रसिद्‌धि
हुनर - कौशल
तमन्ना - इच्छा
निरक्षर - अनपढ़
लोहा मानना - प्रभुत्व स्वीकार करना
फ़रमाइश - माँग
प्रदर्शनी - नुमाइश
अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर


(1)


लौटी तो देखा तीन-चार बच्चे उसके कमरे के दरवाज़े पर खड़े उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आते ही बोली, "आ गए, बच्चो! चलो, मैं अभी आई।"

प्रश्न

(i) कौन, कहाँ जाने वाली है और क्यों?


(ii) चित्रा कौन है? अरुणा ने चित्रा के बनाए चित्र को देखकर क्या कहा?

(iii) अरुणा का चरित्र-चित्रण कीजिए।


(iv) चित्रा चित्रकला से जुड़ी है और अरुणा समाज-सेवा से। क्या इस दृष्टि से अरुणा को भी कलाकार माना जा सकता है? अपने विचार लिखिए।

उत्तर

(i) अरुणा, जो कहानी की मुख्य पात्रा है, होस्टल के बाहर मैदान में गरीब चौकीदारों, नौकरों और चपरासियों के बच्चों को पढ़ाने जाने वाली थी। वह एक प्रतिबद्‌ध समाज-सेविका है।


(ii) चित्रा अरुणा की घनिष्ठ मित्र और एक अच्छी चित्रकार है। कहानी की शुरुआत में जब चित्रा ने अरुणा को नींद से जगाकर अपनी बनाई पेंटिंग दिखाई तो अरुणा ने कहा कि वह चित्र किधर से देखे क्योंकि उसे चित्रा के द्‌वारा बनाए गए चित्र समझ में नहीं आते थे। उसने चित्रा से आगे कहा कि वह जब भी कोई चित्र बनाए तो उसका नाम जरूर लिख दिया करे ताकि यह समझने में गलती न हो कि आखिर चित्र में  कौन-सा जीव है।


(iii) अरुणा कहानी की प्रमुख पात्रा है और चित्रा की घनिष्ठ मित्र है। वह होस्टल में रहकर पढ़ाई करती है किन्तु उसका मन समाज-सेवा में ज्यादा लगता है। वह हर समय समाज-सेवा में व्यस्त रहती है। वह गरीब बच्चों को पढ़ाना अपना कर्त्तव्य समझती है। वह भावुक, संवेदनशील, दयालु, दूसरों के दुख को अपना दुख समझने वाली,दूसरों की समस्या व संकट में स्वयं भुला देने वाली लड़की है। अरुणा एक भिखारिन की मृत्यु होने पर उसके अनाथ बच्चों को अपनाकर उन्हें अपनी ममता की छाया प्रदान करती है।

(iv) चित्रा चित्रकार है। अरुणा समाज सेविका है। वह समाज के छोटे-बड़े सभी लोगों का जीवन सँवारने का प्रयत्न कर रही है। चित्रा मनुष्य और समाज के बाहरी रूप को कागज के पन्नों पर उकेरने का कलात्मक कार्य करती ह। अरुणा मनुष्य और समाज की आत्मा में निहित संवेदनाओं को सँवारने का लोकहित कार्य करती है। एक दुखी मनुष्य का चित्र बनाने से बड़ी कला मनुष्यों के जीवन को सँवारने में है। मेरे अनुसार अरुणा मानव-जीवन की कलाकार है। इस दृष्टि से अरुणा भी एक श्रेष्ठ कलाकार है।




(2)


"क्या....!" चित्रा की आँखें विस्मय से फैली रह गईं।
"क्या सोच रही है चित्रा?"
"कुछ नहीं...मैं...सोच रही थी कि..." पर शब्द शायद उसके विचारों में खो गए।
प्रश्न

(i) ऐसी क्या बात हुई जिसे सुनकर चित्रा की आँखें फैली की फैली रह गईं? समझाकर लिखिए।

(ii) किस तस्वीर को प्रथम पुरस्कार व प्रसिद्‌धि मिली थी? वह किस जगह का चित्र था?

(iii) अरुणा के किन शब्दों से चित्रा सोच में पड़ गई और अपने ही विचारों में खो गई? चित्रा की सोच के आधार पर अपने विचार लिखिए। 

(iv) कला को सत्य, शिव और सुन्दर होना चाहिए - कहानी के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।

उत्तर

(i) विदेश जाकर चित्रा मशहूर चित्रकार बन गई। अख़बारों में भिखारिन और दो अनाथ बच्चों के उस चित्र की बहुत प्रशंसा हुई जिसने चित्रा को शोहरत की बुलंदियों पर पहुँचा दिया। जब दिल्ली में चित्रा की चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया तब वहाँ अरुणा भी उस मृत भिखारिन के दो बच्चों के साथ पहुँची जिसे अरुणा ने गोद ले लिया था। चित्रा के पूछने पर जब अरुणा ने बताया कि ये दोनों बच्चे उसी भिखारिन के हैं जिसे देखकर चित्रा ने रफ़ स्केच बनाया था तब चित्रा की आँखें फैली की फैली रह गई।
(ii) विदेश जाकर चित्रा कला उन्न्ति के शिखर पर पहुँच गई। विदेश में उसकी कला बहुत सराही गई। विशेषकर भिखारिन व उसके दोनों अनाथ बच्चों की तस्वीर की प्रशंसा से अनेक समाचार-पत्रों के पन्ने रंग गए थे। अनेक प्रतियोगिताओं में चित्रा का "अनाथ" शीर्षकवाला चित्र प्रथम पुरस्कार प्राप्त कर चुका था। वह चित्र,चित्रा ने अपने होस्टाल के बाहर गर्ग स्टोर के सामने पेड़ के नीचे बनाई थी, जहाँ एक भिखारिन अपने दो बच्चों को अनाथ छोड़कर मर गई थी।
(iii) चित्र-प्रदर्शनी के समय जब चित्रा ने अरुणा के साथ आए दोनों बच्चों के बारे में पूछा कि वे किसके हैं तब अरुणा ने बताया कि वे दोनों बच्चे उसके हैं। चित्रा ने इसे अरुणा का मज़ाक समझा। जब बच्चे पिता के साथ विदा हुए तब चित्रा ने दोबारा पूछा कि ये प्यारे बच्चे किसके हैं। इस पर अरुणा ने "अनाथ" शीर्षक वाली तस्वीर के दोनों बच्चों पर उँगली रखकर कहा कि ये ही वे दोनों बच्चे हैं। यह सुनकर चित्रा के पैरों तले की धरती खिसक गई। वह स्तब्ध रह गई। वह विचारों में खो गई कि जीवन का उद्‌देश्य क्या है और उसकी सार्थकता किसमें हैं। उसने पहचाना कि जो शोहरत उसने पायी है, वह अरुणा के नि:स्वार्थ सेवाभाव के आगे कितनी फीकी है।

(iv) मानव जीवन में कला और संस्कृति का बहुत महत्त्व है। कला के विभिन्न रूपों के माध्यम से मानव-जीवन में आदर्श और यथार्थ का मिलन संभव होता है। कला के विभिन्न रूपों की सार्थकता सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दरम्‌ में ही निहित है। संगीत, नृत्य, चित्रकला, मूर्तिकला आदि कला के कई रूप हैं जिसमें जीवन के सत्य को मानव कल्याण अर्थात्‌ शिवम के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए तभी वह कला सुन्दर मानी जाएगी और उसके कलाकार को समुचित सम्मान प्राप्त होगा। प्रस्तुत कहानी में चित्रा ने मृत भिखारिन और उसके दो अनाथ बच्चों की तस्वीर बनाकर जीवन के कटु सत्य को तो अभिव्यक्त कर दिया किन्तु उन बच्चों की अनदेखी कर उसने कला के सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्से शिवम्‌ की अवहेलना कर दी। अत: चित्रा को प्रसिद्‌धि तो प्राप्त हो गई लेकिन वह श्रेष्ठ कलाकार नहीं बन सकी।


अपना-अपना भाग्य
जैनेंद्र कुमार


(जन्म:1905 - निधन:1988)

जैनेंद्र प्रेमचंद-परम्परा के प्रमुख साहित्यकारों में एक प्रसिद्‌ध नाम है। इन्होंने उच्चशिक्षा काशी विश्वविद्‌यालय से प्राप्त की। सन्‌ 1921 ई० में  पढ़ाई छोड़कर, गाँधीवादी विचारधारा से प्रभावित होकर असहयोग आंदोलन से जुड़ गए। नागपुर में इन्होंने राजनीतिक पत्रों में संवाददाता के रूप में भी कार्य किया। इनकी प्रथम कहानी ’खेल’ विशाल भारत पत्रिका में प्रकाशित हुई। 1929 में इनका पहला उपन्यास ’परख’ प्रकाशित हुआ जिस पर उन्हें हिन्दुस्तान अकादमी का पुरस्कार भी मिला। जैनेंद्र ने अपनी रचनाओं में  पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। जैनेंद्र कुमार की भाषा सहज है, पर जहाँ विचारों की अभिव्यक्ति का मामला आता है, उनकी भाषा गम्भीर हो जाती है। इनकी भाषा में अरबी, फ़ारसी, उर्दू तथा अंग्रेजी भाषा के शब्दों का भी प्रयोग किया गया है।
प्रमुख रचनाएँ - फाँसी, जयसंधि, वातायन, एक रात, दो चिड़ियाँ, सुनीता, त्यागपत्र, कल्याणी, सुखदा आदि।

कठिन शब्दार्थ

निरुद्‌देश्य - बिना किसी उद्‌देश्य के
सनक - धुन, एकाएक मन में उठनेवाला विचार
कुढ़ना - चिढ़ना
प्रकाश-वृत्त - रोशनी का घेरा
झुर्रिया - सिकुड़न
कोस - लगभग तीन किलोमीटर की दूरी
झुंझलाहट - चिड़चिड़ापन
मसहरी - मच्छरदानी
असमंजस - दुविधा
फिलासफी - उपदेश
निठुराई - कठोरता
बेहयाई - बेशर्मी
कफ़न - मृत शरीर को लपेटने के लिए कपड़ा
प्रेतगति से बढ़ना - बहुत तेज चाल से बढ़ना


अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर


(1)


चुप-चुप बैठे तंग हो रहा था, कुढ़ रहा था कि मित्र अचानक बोले - "देखो वह क्या है?"
मैंने देखा कि कुहरे की सफेदी में कुछ ही हाथ दूर से एक काली-सी मूर्ति हमारी तरफ आ रही थी। मैंने कहा - "होगा कोई"


प्रश्न

(i) लेखक तंग क्यों हो रहे थे?


(ii) दोनों मित्र किस शहर में और कहाँ बैठे हुए थे?


(iii) उन्होंने क्या देखा? लेखक ने क्यों कहा "होगा कोई"? पहली ही नज़र में यह कैसे पता चला कि लड़का बहुत गरीब है?


(iv) लड़के ने अपने बारे में लेखक को क्या-क्या बताया?


उत्तर


(i) लेखक तंग  रहे थे, क्योंकि सर्दी का मौसम था और शाम हो रही थी। लेखक कड़ाके की ठंड से बचने के लिए होटल वापस लौट जाना चाहते थे पर उनका मित्र वहाँ से जाने की अपनी इच्छा जाहिर ही नहीं कर रहा था।


(ii) दोनों मित्र नैनीताल में थे और उस समय वे होटल से निकलकर घूमने के लिए आए थे। शाम का समय था और दोनों निरुद्‌देश्य घूमने के बाद सड़क के किनारे एक बेंच पर आकर आराम से बैठ गए थे।


(iii) लेखक ने देखा कि कुहरे की सफेदी में कुछ ही हाथ की दूरी से एक काली छाया-मूर्ति उनकी तरफ बढ़ रही है लेकिन लेखक ठंड से परेशान हो चुके थे और होटल लौटना चाहते थे। उन्हें किसी चीज़ में दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उन्होंने अनमने भाव से कह दिया "होगा कोई"।
लेखक और उनके मित्र को पहली ही नज़र में ही लग गया कि लड़का बहुत गरीब है क्योंकि लड़का नंगे पैर, नंगे सिर और इतनी सर्दी में सिर्फ एक मैली-सी कमीज़ शरीर पर पहने हुए था। रंग गोरा था फिर भी मैल से काला पड़ गया था। उसके माथे पर झुर्रियाँ पड़ गई थीं।


(iv) लड़के ने लेखक को बताया कि वह एक दुकान पर नौकरी करता था, सारे काम के लिए एक रुपया और झूठा खाना मिलता था। अब वह नौकरी भी छूट गई थी। उसने बताया कि वह अपने साथी के साथ नैनीताल से पन्द्रह कोस दूर गाँव से काम की तलाश में आया था। गाँव पर उसके कई भाई-बहन थे। माँ-बाप इतने गरीब थे कि उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था। मालिक ने उसके साथी को इतना मारा कि उसकी मृत्यु हो गई है।
 
(2)

मोटर में सवार होते ही यह समाचार मिला। पिछली रात एक पहाड़ी बालक सड़क के किनारे - पेड़ नीचे ठिठुरकर मर गया।

प्रश्न

(i) किसे, कब और कौन-सा समाचार मिला ?

(ii) लेखक का मित्र उस पहाड़ी लड़के को कुछ देना चाहता था, पर क्यों नहीं दे पाया?

(iii) "आदमियों की दुनिया" ने उस लड़के के पास क्या उपहार छोड़ा ?

(iv)"अपना-अपना भाग्य" कहानी में कहानीकार ने किस समस्या को उजागर किया है ?

उत्तर

(i) जब लेखक और उसका मित्र वापस जाने की तैयारी कर रहे थे तब उन्हें यह समाचार मिला कि पिछली रात एक पहाड़ी लड़का सड़क के किनारे पेड़ के नीचे ठंड से ठिठुर कर मर गया।

(ii) लेखक का मित्र उस बेसहारा लड़के को कुछ पैसे देना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने अपनी जेब में हाथ भी डाला लेकिन उन्हें वहाँ सिर्फ दस रुपए के नोट ही मिले, खुले पैसे नहीं थे। लेखक का मित्र बजट बिगड़ने के भय से उस लड़के को दस रुपए का नोट नहीं देना चाहता था।

(iii) आदमियों की दुनिया ने उस बेसहारा बालक के लिए मौत का उपहार छोड़ा था। दुनिया के कुछ निष्ठुर और स्वार्थी लोगों ने सिर्फ अपने बारे में सोचा और उस गरीब, बेसहारा और भूखे बालक को ठंड भरी रात में काले चिथड़ों की कमीज़ में मरने के लिए छोड़ दिया। यदि लेखक या उसके मित्र ने उसकी थोड़ी-सी मदद कर दी होती तो शायद उसकी ऐसी दुर्गति न होती।

(iv) "अपना-अपना भाग्य" के द्‌वारा लेखक जैनेंद्र कुमार ने सामाजिक असमानता की समस्या को प्रस्तुत किया है। समाज में गरीब और लाचार बालकों का शोषण दिखाना लेखक का उद्‌देश्य है। लेखक ने सामाजिक असमानता के प्रति तथाकथित बुद्‌धिजीवियों की उपेक्षापूर्ण  उदासीनता एवं असमर्थता की मनोवृत्ति पर भी तल्ख व्यंग्य किया है। लेखक और उसका मित्र  असहाय और बेबस बालक के प्रति अपनी जिज्ञासा तो प्रकट करते हैं लेकिन जब उसकी मदद करने का समय आता है तब वे अपनी हृदयहीनता और अमानवीयता का परिचय देते हैं। वे बालक की सहायता गर्म कपड़े देकर, खाना देकर, पैसे देकर या नौकरी की व्यवस्था करके कर सकते थे पर उन्होंने बालक की इस स्थिति को उसके भाग्य पर छोड़कर अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं किया।

काकी
सियारामशरण गुप्त


(जन्म:1895 - निधन:1963)


सियारामशरण गुप्त का जन्म सेठ रामचरण कनकने के परिवार में श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुज के रूप में चिरगाँव, झांसी में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी। सन् 1929 ई. में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी के सम्पर्क में आये। कुछ समय वर्धा आश्रम में भी रहे। उनकी पत्नी तथा पुत्रों का निधन असमय ही हो गया था अतः वे दु:ख वेदना और करुणा के कवि बन गये। 1914 ई. में उन्होंने अपनी पहली रचना मौर्य विजय लिखी।

सियारामशरण गुप्त गांधीवाद की परदु:खकातरता, राष्ट्रप्रेम, विश्वप्रेम, विश्व शांति, सत्य और अहिंसा से आजीवन प्रभावित रहे। इनके साहित्य में शोषण, अत्याचार और कुरीतियों के विरुद्‌ध संघर्ष का स्वर विद्‌यमान है।
गुप्त जी की भाषा सहज तथा व्यावहारिक है। 1941 ई. में इन्हें नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्‌वारा "सुधाकर पदक" प्रदान किया गया।

प्रमुख रचनाएँ

खण्ड काव्य - अनाथ, आर्द्रा, विषाद, दूर्वा दल, बापू, सुनन्दा और गोपिका।
कहानी संग्रह - मानुषी
नाटक - पुण्य पर्व
अनुवाद- गीता सम्वाद
कविता संग्रह- अनुरुपा तथा अमृत पुत्र
काव्यग्रन्थ- दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी तथा आत्मोसर्ग।
उपन्यास- अन्तिम आकांक्षा तथा नारी और गोद।
निबन्ध संग्रह- झूठ-सच।



 काकी

"काकी" सियारामशरण गुप्‍त की एक प्रसिद्‌ध कहानी है। कहानी में एक बच्‍चा अपनी काकी (माँ)  की मृत्‍यु से दुखी है। वह यह नहीं समझता है कि मृत्‍यु क्‍या है। सब उससे कहते हैं कि उसकी काकी आसमान में चली गई है। बच्‍चा अपने भोलेपन में पतंग के माध्‍यम से काकी को वापस लाने की कोशिश करता है। बालमन किस तरह की  अबोध कल्‍पना करता है, यह कहानी इसी बात की सफल अभिव्यक्ति करती है।


कठिन शब्दार्थ
विलाप - बिलख-बिलखकर रोना
कुहराम - उपद्रव, शोरगुल
रुदन - रोना
 उत्कंठित - अधीर, लालायित
स्टूल - छोटा मेज
प्रफुल्ल - प्रसन्न, खिला हुआ
मुखबिर - भेद खोलने वाला
अन्यमनस्क - जिसका मन कहीं और लगा हो
समवयस्क - समान आयु का
अनंतर - उसके पश्चात
अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर
(1)
वर्षा के अनंतर एक दो दिन में ही पृथ्वी के ऊपर का पानी तो अगोचर हो जाता है, परंतु भीतर-ही-भीतर उसकी आर्द्रता जैसे बहुत दिन तक बनी रहती है, वैसे ही उसके अंतस्तल में वह शोक जाकर बस गया था।
प्रश्न
(i) यहाँ किसकी बात की जा रही है ? उसका परिचय दीजिए।
(ii) उपर्युक्त पंक्तियों का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।
(iii) उसके व्यवहार में क्या परिवर्तन आया ? पंक्तियों के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
(iv) "बालक का हृदय अत्यंत कोमल, भावुक और संवेदनशील होता है और
वे मातृ-वियोग की पीड़ा को सहन नहीं कर पाते" - प्रस्तुत कहानी "काकी" के माध्यम से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर
(i) यहाँ श्यामू की बात की जा रही है। श्यामू विश्वेश्वर का पुत्र है और उसकी काकी (माँ) का देहांत हो चुका है। वह एक अबोध बालक है। वह अपनी माँ से बहुत प्यार करता है और उसका वियोग सह नहीं सकता। वह जन्म-मृत्यु के सत्य से अनजान है इसलिए उसे लगता है कि उसकी माँ ईश्वर के पास गई है जिसे वह पतंग और डोर की सहायता से नीचे उतार सकता है। इसके लिए वह अपने पिता के कोट की जेब से पैसे चोरी करता है।
(ii) प्रस्तुत पंक्तियों का संदर्भ यह है कि श्यामू अपनी माँ की मृत्यु के बाद बहुत रोता है और उसे चुप कराने के लिए घर के बुद्‌धिमान गुरुजनों ने उसे यह विश्वास दिलाया कि उसकी माँ उसके मामा के यहाँ गई है। लेकिन आस-पास के मित्रों से उसे इस सत्य का पता चलता है कि उसकी माँ ईश्वर के पास गई है। इस प्रकार बहुत दिन तक रोते रहने के बाद उसका रुदन तो शांत हो जाता है लेकिन माँ के वियोग की पीड़ा उसके हृदय में शोक बनकर बस जाती है।
(iii) माँ की मृत्यु के बाद श्यामू अत्यंत दुखी हो गया। वह पहले बहुत रोया करता था लेकिन समय के साथ धीरे-धीरे उसका रोना शांत होता गया, परंतु उसके अंतस्तल की पीड़ा शांत न हो सकी। वह प्राय: अकेला रहने लगा और हमेशा आकाश की ओर देखता रहता। जिस प्रकार वर्षा के एक-दो दिन बाद धरती के ऊपर का पानी तो सूख जाता है लेकिन उसके भीतर की आर्द्रता बहुत दिन तक बनी रहती है, उसी प्रकार श्यामू का रोना तो बंद हो गया लेकिन मातृ-वियोग की पीड़ा उसके हृदय में जाकर बस गई थी।
(iv) प्रस्तुत कहानी "काकी" एक बाल-मनोवैज्ञानिक कहानी है। जिसमें एक बालक के मातृ-वियोग की पीड़ा को दर्शाया गया है। कहानी में श्यामू  माँ की मृत्यु के बाद उस पीड़ा को सहन नहीं कर पाता है और उसका मन कहीं नहीं लगता है। जीवन-चक्र से अनभिज्ञ वह अपनी माँ को ईश्वर के यहाँ से लाने के लिए पैसों की चोरी करता है और डोरी मँगवाता है जिसकी सहायता से वह अपनी मरी माँ को आकाश से नीचे धरती पर ला सके। इस प्रकार यह साबित होता है कि बालकों का हृदय अत्यंत कोमल, भावुक और संवेदनशील होता है और वे  मातृ-वियोग की पीड़ा को सहन नहीं कर पाते हैं।


(2)

अकस्मात्‌ शुभ कार्य में विघ्न की तरह उग्र रूप धारण किए हुए विश्वेश्वर वहाँ आ घुसे।

प्रश्न

(i) "शुभ कार्य" और "विघ्न" शब्दों का प्रयोग किस-किस संदर्भ में किया गया है ?

(ii) श्यामू पतंग पर किससे, क्या लिखवाता है और क्यों ?

(iii) भोला का परिचय देते हुए बताइए कि वह श्यामू की मदद किस प्रकार करता है ?

(iv) विश्वेश्वर हतबुद्‌धि होकर क्यों खड़े रह गए ? घटना का विवरण देते हुए लिखिए।

उत्तर

(i) "शुभ कार्य" का प्रयोग उस संदर्भ में किया गया है जब श्यामू अपनी माँ को ईश्वर  के यहाँ से नीचे लाने के लिए पतंग और दो मज़बूत रस्सियाँ मँगवाता है और उस पर  काकी लिखवाता है। श्यामू अत्यंत प्रसन्न मन से अपने साथी भोला के साथ पतंग में रस्सी बाँध रहा था।

"विघ्न" का प्रयोग उस संदर्भ में किया गया है जब श्यामू चोरी किए गए पैसे से पतंग खरीदता है।जैसे ही वह शुभ कार्य संपन्न करने जाता है वैसे ही उसके पिता विश्वेश्वर विघ्न के रूप में वहाँ उपस्थित हो जाते हैं।

(ii) श्यामू पतंग पर जवाहर भैया से एक कागज़ पर काकी लिखवाता है। ताकि वह पतंग सीधे उसकी माँ के पास चली जाए और उसकी माँ उस पर अपना नाम देखकर पतंग की सहायता से आसानी से राम के यहाँ से नीचे उतर आए।

(iii) भोला सुखिया दासी का लड़का था और श्यामू का हमउम्र था। वह श्यामू से अधिक चतुर और समझदार था, इसलिए वह उसे सलाह देता है कि श्यामू मोटी रस्सी मँगवा ले। पतली रस्सी से काकी नीचे नहीं उतर पाएगी और रस्सी के टूटने का भय भी बना रहेगा। भोला बहुत डरपोक भी था, इसलिए विश्वेश्वर के एक ही डाँट से वह सारा रहस्य उजागर कर देता है।

(iv) विश्वेश्वर को जब इस बात का पता चलता है कि उसके कोट  की जेब से एक रुपए की चोरी हुई है तब वह भोला और श्यामू के पास आते हैं। भोला को डाँटने से उन्हें श्यामू की सच्चाई का पता चलता है कि उसने ही रुपए की चोरी की है। वे श्यामू को धमकाने और मारने के बाद पतंग फाड़ देते हैं। लेकिन जब उन्हें भोला द्‌वारा यह पता चलता है कि श्यामू इस पतंग के द्‌वारा काकी को राम के यहाँ से नीचे लाना चाहता है, विश्वेश्वर हतबुद्‌धि होकर वहीं खड़े रह जाते हैं।

नेता जी का चश्मा 
स्वयं प्रकाश
(जन्म: 1947)
स्वयं प्रकाश आधुनिक हिन्दी साहित्य में एक प्रसिद्‌ध नाम है। स्वयं प्रकाश जी को प्रेमचंद परम्परा का महत्त्वपूर्ण लेखक माना जाता है। अब तक इनके पाँच उपन्यास और नौ कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कहानियों का अनुवाद रूसी भाषा में भी हो चुका है।
स्वयं प्रकाश जी ने अपनी रचनाओं में मध्यमवर्गीय जीवन की समस्याओं, उनकी पीड़ाओं और उनके संघर्षों के विविध पक्षों को पाठकों के सम्मुख उपस्थित किया है।
इन्होंने अपनी खिलंदड़ी किन्तु अत्यंत सहज भाषा में रचनाएँ लिखकर अपने पाठकों का मन मोह लिया है।
इन्हें पहल सम्मान, वनमाला सम्मान, राजस्थान साहित्य अकादमी सम्मान तथा 2011 में आनंद सागर कथाक्रम सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
प्रमुख रचनाएँ:  प्रतीक्षा, बलि, चौथा हादसा, जंगल का दाह, लाइलाज
सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन आदि।

नेता जी का चश्मा हर भारतीय के अंदर देशभक्ति की भावना और अपने स्वतंत्रता-सेनानियों के प्रति सम्मान का भाव जागृत करने का प्रयास करती है।
प्रस्तुत कहानी के माध्यम से लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि जब हम अपने महापुरुषों की प्रतिमा की स्थापना करते हैं तब उसका उद्‌देश्य यह होता है कि उस महान व्यक्ति की स्मृति हमारे मन में बनी रहे। हमें यह स्मरण रहे कि उस महापुरुष ने देश व समाज के हित के लिए किस तरह के महान कार्य किये। उसके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर हम भी अच्छे कार्य करें, जिससे समाज व राष्ट्र का भला हो। 
हमारा यह उत्तरदायित्व होना चाहिए कि हम उस प्रतिमा की गरिमा का ध्यान रखें। हम न तो स्वयं उस प्रतिमा का अपमान करें अथवा उसे क्षति पहुँचाएँ और न ही दूसरों को ऐसा करने दें। हम उस प्रतिमा के प्रति पर्याप्त श्रद्‌धा प्रकट करें एवं उस महापुरुष के आदर्शों पर स्वयं भी चलें तथा दूसरे लोगों को भी चलने के लिए प्रेरित करें। 

कठिन शब्दार्थ

दरकार - जरूरी
निष्कर्ष - नतीज़ा
भूतपूर्व - पहले का
खुशमिज़ाज - खुश रहने वाला
कौतुक - हैरानी
प्रतिष्ठापित - स्थापित किया गया
मरियल - दुर्बल, कमज़ोर
कौतूहल - उत्सुकता
लागत - खर्च
पारदर्शी - जिसके आर-पार दिखाई दे
कत्था - खैर की छाल का सत जो पान में लगाया जाता है

अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर
(1)

क्या कैप्टन चश्मेवाला नेताजी का साथी है या आज़ाद हिंद फ़ौज का भूतपूर्व सिपाही ?

प्रश्न
 

(i) प्रस्तुत पंक्ति कौन, किससे पूछ रहा है ?

(ii) वक्ता का परिचय दीजिए ।

(iii) श्रोता चश्मेवाले के लिए क्या टिप्पणी करता है ? श्रोता की टिप्पणी
       पर अपनी प्रतिक्रिया दीजिए।


(iv) सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे ?


उत्तर


(i) प्रस्तुत पंक्ति हालदार साहब पानवाले से पूछ रहे हैं।


(ii) हालदार साहब इस कहानी के मुख्य पात्र तथा सूत्रधार भी हैं जिनके माध्यम से यह कहानी आगे बढ़ती है। हालदार साहब किसी कंपनी के अधिकारी हैं। वे अत्यंत भावुक, संवेदनशील तथा देशभक्त व्यक्ति हैं। उन्हें कस्बे के मुख्य बाज़ार के मुख्य चौराहे पर स्थापित नेताजी की संगमरमर की प्रतिमा में गहरी दिलचस्पी है।


(iii) कैप्टन के बारे में हालदार साहब द्वारा पूछे जाने पर पानवाले ने टिप्पणी की कि वह लंगड़ा फ़ौज में क्या जाएगा, वह तो पागल है। पानवाले द्वारा ऐसी टिप्पणी करना उचित नहीं था। कैप्टन शारीरिक रूप से अक्षम था जिसके लिए वह फौज में नहीं जा सकता था। परंतु उसके हृदय में जो अपार देशभक्ति की भावना थी, वह किसी फौजी से कम नहीं थी। कैप्टन अपने कार्यों से जो असीम देशप्रेम प्रकट करता था उसी कारण पानवाला उसे पागल कहता था। ऐसा कहना पानवाले की स्वार्थपरता की भावना को दर्शाता है, जो सर्वथा अनुचित है।
वास्तव में तो पागलपन की हद तक देश के प्रति त्याग व समर्पण की भावना रखनेवाला व्यक्ति श्रद्‌धा का पात्र है, उपहास का नहीं। 


(iv) सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन इसलिए कहते थे क्योंकि उसके अंदर देशभक्ति की भावना कूट-कूटकर भरी हूई थी। वह स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले सेनानियों का भरपूर सम्मान करता था| वह नेताजी की प्रतिमा को बार-बार चश्मा पहना कर देश के प्रति अपनी अगाध श्रद्‌धा प्रकट करता था। देश के प्रति त्याग व समर्पण की भावना उसके हृदय में किसी भी फ़ौजी से कम नहीं थी।


(2)

बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-ज़िन्दगी सब कुछ होम कर देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है।


प्रश्न

(i) प्रस्तुत पंक्तियों का संदर्भ स्पष्ट कीजिए।

(ii) कैप्टन की मृत्यु के बाद कस्बे में घुसने से पहले हालदार साहब के मन
      में क्या ख्याल आया ?

(iii) होम कर देनेवालों  का तात्पर्य स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि कौन
       किस पर हँसते हैं और क्यों ?

(iv) मूर्ति लगाने के क्या उद्‌देश्य होते हैं और आप अपने इलाके के चौराहे
       पर किस व्यक्ति की मूर्ति स्थापित करवाना चाहेंगे और क्यों ? अपने
       विचार व्यक्त करें।

उत्तर

(i) दो साल तक हालदार साहब कस्बे से गुज़रते और नेताजी की मूर्ति में बदलते हुए चश्मे को देखते लेकिन एक बार मूर्ति के चेहरे पर चश्मा नहीं था। जब उन्होंने पानवाले से इस संबंध में पूछा तब पानवाले ने उदास होकर बताया कि चश्मा बदलने वाला कैप्टन मर गया है। उपर्युक्त पंक्तियाँ इसी संदर्भ में प्रयुक्त हुई हैं।

(ii) पंद्रह दिन बाद जब हालदार साहब उसी कस्बे से गुज़रे तब उनके मन में ख्याल आया कि कस्बे की हृदयस्थली में सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा अवश्य होगी लेकिन उस प्रतिमा के चेहरे पर चश्मा नहीं होगा क्योंकि उस प्रतिमा को बनाने वाला मास्टर साहब चश्मा बनाना भूल गया है और देशभक्ति की भावना से भरा कैप्टन मर गया है जो प्रतिमा के चेहरे पर चश्मा पहनाया करता था।

(iii) होम कर देनेवालों  का तात्पर्य  है कुर्बान कर देने वालों।
 उस स्वार्थी और लालची कौम का भविष्य कैसा होगा जो उन देशभक्तों की हँसी उड़ाती है जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-ज़िंदगी सब कुछ त्याग कर देते हैं। साथ ही वह ऐसे अवसर तलाशती रहती है, जिसमें उसकी स्वार्थ की पूर्ति हो सके, चाहे उसके लिए उन्हें अपनी नैतिकता की भी तिलांजलि क्यों न देनी पड़े। अर्थात आज हमारे समाज में स्वार्थ पूर्ति के लिए अपना ईमान तक बेच दिया जाता है।  यहाँ देशभक्ति को मूर्खता समझा जाता है और देशभक्त को मूर्ख।
(iv) मूर्ति लगाने का प्रमुख उद्देश्य यह होता है कि उक्त महान व्यक्ति की स्मृति हमारे मन में बनी रहे। हमें यह स्मरण रहे कि उस महापुरुष ने देश व समाज के हित के लिए किस तरह के महान कार्य किये। उसके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर हम भी अच्छे कार्य करें, जिससे समाज व राष्ट्र का विकास हो सके।
हम अपने इलाके के चौराहे पर महात्मा गाँधी की मूर्ति स्थापित करवाना चाहेंगे। इसका कारण यह है कि आज के परिवेश में जिस प्रकार से हिंसा, झूठ, स्वार्थ, वैमनस्य, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार आदि बुराइयाँ व्याप्त होती जा रही हैं, उसमें गांधी जी के आदर्शों की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। गांधीजी की मूर्ति स्थापित होने से लोगों के अंदर सत्य, अहिंसा, सदाचार, साम्प्रदायिक सौहार्द आदि की भावनाएं उत्पन्न होंगी। इससे समाज व देश का वातावरण अच्छा बनेगा।

जामुन का पेड़
कृष्ण चंदर
(1914 - 1977)
 हिन्दी और उर्दू के कहानीकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन १९६९ में पद्‌म भूषण से सम्मानित किया गया था। उन्होने मुख्यतः उर्दू में लिखा किन्तु भारत की स्वतंत्रता के बाद हिन्दी में लिखना शुरू कर दिया। इन्होंने कई कहानियाँ, उपन्यास और रेडियो व फ़िल्मी नाटक लिखे। इनका व्यंग्यात्मक ( Ironical) उपन्यास एक गधे की कहानी बहुत चर्चित रही।
कृष्ण चंदर जी ने अपनी रचनाओं में सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्यात्मक प्रहार किया।
कृष्ण चंदर जी की भाषा मुहावरेदार और सजीव है। उसमें व्यंग्य, विनोद और विचारों का समावेश है।
प्रमुख रचनाएँ - नज़ारे, जिन्दगी का मोड़, अन्नदाता, मैं इंतज़ार करूँगा, दिल किसी का दोस्त नहीं, किताब का कफ़न, एक रुपिया, एक फूल, मिट्‌टी के सनम, रेत का महल, तीन गुंडे आदि।
कठिन शब्दार्थ
ताज्जुब - हैरत, आश्चर्य
वज़नी - भारी
मनचला - जो स्वभाव से रसिक हो
हुकूमत - सरकार
अंतर्गत - सम्मिलित
लावारिस - जिसका कोई वारिस न हो
छान-बीन - जाँच-पड़ताल
रद्‌द करना - अस्वीकार करना, निरस्त करना
तग़ाफुल - उपेक्षा
खाक होना - बर्बाद होना, मिट्‌टी में मिलना
अफ़वाह - बेबुनियाद बात
वज़ीफ़ा - स्कॉलरशिप, छात्र अनुदान
दरख्वास्त - अर्जी, आवेदन
पाँत - पंक्ति

यह सर्वविदित है कि भारत में नौकरशाही (सरकारी कर्मचारी) का मौजूदा स्वरूप ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की देन है। इसके कारण यह वर्ग आज भी अपने को आम भारतीयों से अलग, उनके ऊपर, उनका शासक और स्वामी समझता है। अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए यह वर्ग जितना सचेष्ट रहता है, आम जनता के हितों, जरूरतों और अपेक्षाओं के प्रति उतना ही उदासीन रहता है।
भारत जब गुलाम था, तब महात्मा गांधी ने विश्वास जताया था कि आजादी के बाद अपना राज यानी स्वराज्य होगा, लेकिन आज जो हालत है, उसे देख कर कहना पड़ता है कि अपना राज है कहाँ ?  आज चतुर्दिक अफसरशाही का जाल है। लोकतंत्र की छाती पर सवार यह अफसरशाही हमारे सपनों को चूर-चूर कर रही है।
देश की पराधीनता के दौरान इस नौकरशाही का मुख्य मकसद भारत में ब्रिटिश हुकूमत को  मजबूत करना था। जनता के हित, उसकी जरूरतें और उसकी अपेक्षाएँ दूर-दूर तक उसके सरोकारों में नहीं थे।
कृष्ण चंदर की कहानी जामुन का पेड़ सरकारी विभागों की लालफ़ीताशाही का पर्दाफ़ाश करती है। इस कहानी के माध्यम से लेखक ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों में फैली अकर्मण्यता पर भी करारा व्यंग्य किया है। हर विभाग अपनी ज़िम्मेदारी को दूसरे विभाग पर तरह-तरह के बहाने बनाकर डाल सेता है। फ़ाइल एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रहती है किन्तु परिणाम कुछ नहीं निकलता है।पेड़ के नीचे दबा आदमी प्राण-रक्षा के लिए मृत्यु से जूझता हुआ अंतत: मारा जाता है। प्राय: सरकारी विभाग और दफ़्तर आम व्यक्ति के प्राणों तक को अपनी विकृत फाइल कल्चर का शिकार बना देते हैं।
सरकारी कार्यशैली की निकृष्टता, उसमें निहित अमानवीयता, गैर-जनहितवादी अफसरशाही का दबदबा, विभागों के बीच टाला-टाली का खेल, शिक्षित मध्यमवर्ग का ढकोसलापन, सर्वत्र फैला दिमागी दिवालियापन, इस सबको दर्शाना ही इस कहानी का परम लक्ष्य है।
 


अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर


(1)


"सुबह को जब माली ने देखा, तो उसे पता चला कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है।"

प्रश्न


(i) कौन सी घटना की वजह से एक आदमी पेड़ के नीचे दबा पड़ा था ?


(ii) दबे हुए आदमी को देखकर् माली तथा अन्य लोगों की क्या प्रतिक्रिया

      हुई ?

(iii) पहले, दूसरे और तीसरे क्लर्क ने क्या-क्या कहा  ? इससे उनकी किस

       मानसिकता का पता चलता है ?

(iv) कहानी से सरकारी विभागों की कार्य-शैली के बारे में क्या पता चलता

       है ?

उत्तर 


 (i) रात को बड़ी ज़ोर से आँधी चली जिससे व्यापार विभाग के सेक्रेटेरियट
      के लॉन में जामुन का पेड़ गिर गया और उसके नीचे एक व्यक्ति दब
      गया।


(ii) सुबह जब माली ने देखा कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है तो वह दौड़ा-दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी क्लर्क के पास और क्लर्क दौड़ा-दौड़ा सुररिंटेंडेंट के पास गया। सुपरिंटेंडेंट दौड़ा-दौड़ा बाहर लॉन में आया। मिनटों में गिरे हुए पेद के नीचे दबे हुए आदमी के चारों ओर भीड़ इकट्‌ठी हो गई।

(iii) पहले क्लर्क ने कहा कि बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था। दूसरे क्लर्क ने कहा कि इसकी जामुनें कितनी रसीली होती थीं। तीसरा क्लर्क लगभग रुआँसा होकर बोला कि वह फलों के मौसम में झोली भरकर ले जाता था। उसके बच्चे  जामुन को कितनी खुशी से खाते थे। सभी स्वार्थी मानसिकता के हैं। उन्हें किसी आदमी की दुख-तकलीफ से ज्यादा सरोकार नहीं था।

(iv) इस कहानी के माध्यम से लेखक ने सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों में फैली अकर्मण्यता पर भी करारा व्यंग्य किया है। हर विभाग अपनी ज़िम्मेदारी को दूसरे विभाग पर तरह-तरह के बहाने बनाकर डाल सेता है। फ़ाइल एक विभाग से दूसरे विभाग तक घूमती रहती है किन्तु परिणाम कुछ नहीं निकलता है। प्रस्तुत कहानी सरकारी विभागों की लापरवाही और ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ने की प्रवृत्ति को उजागर करती है। इस तरह की कार्य-शैली के अंर्तगत अनावश्यक नियमों का उल्लेख कर विभाग अपनी ज़िम्मेदारी एक-दूसरे पर थोप देते हैं।

(2)

प्रधानमंत्री ने इस पेड़ को काटने का हुक्म दे दिया, और इस घटना की सारी अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने सिर ले ली। कल यह पेड़ काट दिया जाएगा, और तुम इस संकट से छुटकारा हासिल कर लोगे। सुनते हो? आज तुमहारी फ़ाइल पूर्ण हो गई।
प्रश्न

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ कौन, किससे, कब कह रहा है और क्यों ?

(ii) अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी से क्या तात्पर्य है ? यहाँ इन शब्दों का प्रयोग
      किस संदर्भ में किया गया है और क्यों ?

(iii) संकट क्या था ? क्या उस व्यक्ति को संकट से छुटकारा मिल सका ?
       यदि नहीं, तो क्यों ? स्पष्ट कीजिए।

(iv) जामुन का पेड़ कहानी के शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

(i) प्रस्तुत पंक्तियाँ सुपरिंटेंडेंट ने कवि से कहा है। जब दौरे से वापस लौटने पर प्रधानमंत्री जामुन का पेड़ को काटने का आदेश देते हैं तो सुपरिंटेंडेंट खुशी से फूला नहीं समाता। वह इस संवाद को स्वयं दबे हुए व्यक्ति तक पहुँचाता है। वह सोचता है कि अब दबे हुए व्यक्ति का संकट शीघ्र ही दूर हो जाएगा।

(ii) अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी से आशय है - पेड़ काटने पर विदेशों में होने वाली प्रतिक्रिया की ज़िम्मेदारी।
जब फ़ॉरेस्ट डिपार्टमेन्ट (वन विभाग) के आदमी आरी, कुल्हाड़ी लेकर पहुँचे तो उन्हें पेड़ काटने से रोक दिया गया। कारण यह था कि विदेश विभाग से आदेश मिला हुआ था कि उस पेड़ को न काटा जाए क्योंकि
उस पेड़ को दस वर्ष पहले पीटोनिया राज्य के प्रधानमंत्री ने लगाया था। इस बात की पूरी संभावना थी कि उस पेड़ के काटने से पीटोनिया सरकार के साथ हमारे देश के संबंध बिगड़ सकते हैं और उसका प्रभाव हमारे देश को मिलने वाली सहायता पर भी पड़ सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री ने पेड़ काटने की अनुमति देते समय विदेशी विभागों से संबंधित अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।

(iii) तेज आँधी से जामुन के पेड़ के गिरने पर एक व्यक्ति उसके नीचे दब गया था। दबे हुए व्यक्ति के प्राण संकट में थे, लेकिन वन-विभाग से अनुमति लिए बिना उस पेड़ को हटाना संभव नहीं था। वन विभाग की अनुमति मिलने पर विदेश विभाग ने पेड़ काटने के बारे में आपत्ति की थी। अन्त में जब प्रधानमंत्री ने अन्तर्राष्ट्रीय ज़िम्मेदारी अपने सिर पर लेते हुए पेड़ काटने का आदेश दे दिया तो सुपरिंटेंडेंट ने यह समाचार दबे हुए व्यक्ति को दिया कि कल पेड़ काटने का आदेश दे दिया कि कल पेड़ काटकर उसे निकाल लिया जाएगा परन्तु वह इस सुखद समाचार के मिलने से पहले ही दम तोड़ चुका था।

(iv) जामुन का पेड़ कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक है। जब किसी कहानी का शीर्षक सामान्य शाब्दिक अर्थ के अलावा किसी विशेष अर्थ की ओर संकेत करता है तब उस शीर्षक को प्रतीकात्मक शीर्षक की संज्ञा दी जाती है।
प्रस्तुत कहानी में जामुन का पेड़ देश की समस्याओं का प्रतीक है और उसके नीचे दबा व्यक्ति देश का आम नागरिक है जो किसी न किसी बोझ तले दबा हुआ है और छटपटा रहा है। वहीं दूसरी ओर देश की शासन व्यवस्था को चलाने वाला सरकारी कर्मचारी-वर्ग अपने को आम भारतीयों के ऊपर शासक करने वाला स्वामी समझता है। अपने अधिकारों और सुविधाओं के लिए यह वर्ग जितना सचेष्ट रहता है, आम जनता के हितों, जरूरतों और अपेक्षाओं के प्रति उतना ही उदासीन रहता है।
कहानी में जामुन के पेड़ के नीचे दबा व्यक्ति सरकारी कर्मचारियों की उदासीनता और लापरवाही के कारण दम तोड़ देता है। अत: कहानी का शीर्षक सार्थक एवं उपयुक्त है।

भेड़ें और भेड़िये
हरिशंकर परसाई

(जन्म: 1922 - मृत्यु:1995)

हरिशंकर परसाई  हिंदी के प्रसिद्‌ध लेखक और व्यंग्यकार थे। उनका जन्म  होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। वे हिंदी के पहले रचनाकार हैं जिन्होंने व्यंग्य को विधा का दर्जा दिलाया और उसे हल्के–फुल्के मनोरंजन की परंपरागत परिधि से उबारकर समाज के व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। उनकी व्यंग्य रचनाएँ हमारे मन में गुदगुदी ही पैदा नहीं करतीं बल्कि हमें उन सामाजिक वास्तविकताओं के आमने–सामने खड़ा करती है, जिनसे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति का अलग रह पाना लगभग असंभव है। लगातार खोखली होती जा रही हमारी सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था में पिसते मध्यमवर्गीय मन की सच्चाइयों को उन्होंने बहुत ही निकटता से पकड़ा है।

परसाई जी की भाषा अत्यंत सहज होते हुए भी बात को तीखे अंदाज़ में कहने में समर्थ है।

प्रमुख रचनाएँ -

हँसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे, भोलाराम का जीव,
रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज, ज्वाला और जल
इन्हें विकलांग "श्रद्‌धा का दौर" के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

जनतंत्र क्या है ?

जनतंत्र का मतलब होता है जनता द्वारा जनता का शासन ,जनतंत्र में सत्ता आम आदमी के हाथ में होती है , पर यहाँ तो जनतंत्र के मायने कुछ और ही बन कर रह गए हैं ! ये जो लोग सत्ता में बैठे हैं ये आम आदमी के सेवक हैं, इन्हें जो सम्मान, जो शक्ति दी गयी है  वह सिर्फ एक स्वस्थ व्यवस्था संचालन के लिए दी गयी है न कि आम आदमी का खून चूसने के लिए !


भारत में जनतंत्र या लोकतंत्र के चार स्तम्भ माने गए हैं -विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता जिनके द्‌वारा देश की शासन- व्यवस्था सुचारू रूप से चलती है। जनतंत्र में राजनैतिक दलों की अहम भूमिका होती है क्योंकि चुनाव के बाद जिस राजनैतिक दल को पूर्ण बहुमत मिलता है, वह संसद में सरकार का गठन करता है और जनहित तथा जन-कल्याण के लिए नीति-कानून का निर्माण करता है।
जब सत्ताधारी वर्ग भ्रष्ट और बेईमान हो जाता है तब वह सिर्फ़ अपने हितों की रक्षा करता है एवं जन-कल्याण की भावना से विमुख हो जाता है।
यह स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए अत्यंत घातक और विध्वंसकारी साबित होती है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा और मज़बूत लोकतांत्रिक देश है किन्तु यहाँ की अशिक्षा लोकतांत्रिक शक्तियों को कमज़ोर बनाती है। अशिक्षा के कारण भ्रष्ट नेतागण आसानी से अपने चापलूस कवि-लेखक-पत्रकार और धर्मगुरुओं की सहायता से अपने पक्ष में जनमत तैयार करने में सफल हो जाते हैं और सत्ता पर सहजता से उनका नियंत्रण स्थापित हो जाता है।


कठिन शब्दार्थ
सहस्रों - हज़ारों
अवरुद्‌ध - रुका हुआ
क्षुद्र  - छोटा
प्रतिनिधि - नुमाइंदा
सर्वशक्तिमान - सब शक्तियों से युक्त
मुखारविंद - सुंदर मुख
कोरस - समूह गान
सर्वत्र - सब जगह
बंधुत्व - भाईचारा
अंत्येष्टि क्रिया - मृतक का अंतिम कर्म
भावातिरेक - भावों की अधिकता
अजायबघर - म्यूज़ियम, संग्रहालय
अर्पित करना - भेंट करना
फ़ीसदी - प्रतिशत
विचारक - चिन्तक
धर्मगुरु - धर्म की शिक्षा देने वाला
अवतरणों पर आधारित प्रश्नोत्तर

(1)

यह एक भेड़िये की कथा नहीं है, यह सब भेड़ियों की कथा है। सब जगह इस प्रकार प्रचार हो गया और भेड़ों को विश्वास हो गया कि भेड़िये से बड़ा उनका कोई हित-चिन्तक और हित-रक्षक नहीं है।

प्रश्न

(i) "यह सब भेड़ियों की कथा है" - इस कथन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।

(ii) चुनाव के समय भेड़िये का प्रचार किसने  और किस प्रकार किया ?

(iii) भेड़ों को क्या विश्वास हो गया था और क्यों ? समझाकर लिखिए।

(iv) सियारों ने भेड़िये का प्रचार क्यों किया था?


उत्तर


(i) सब भेड़ियों की कथा से तात्पर्य है - सत्ताधारी भ्रष्ट शोषक वर्ग। शोषक वर्ग अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए मिथ्या प्रचार करता है। शोषक वर्ग के आश्रय पर पलने वाला समाज का चापलूस और स्वार्थी वर्ग जिसका प्रतीक यहाँ सियार को बनाया गया है, उनके प्रचार में योगदान देता है और उनके पक्ष में जनमत तैयार करता है। चुनाव में भेड़ियों को सफलता मिलती है और फिर वे भेड़ रूपी समाज के भोले-भाले शोषित वर्गों का खुलकर शोषण करते हैं।

(ii) चुनाव के समय भेड़ियों का प्रचार सियारों ने किया। बूढ़े सियार और तीन  रंगे सियारों ने भेड़िये को संत बताकर उसकी झूठी प्रशंसा की थी और उनके पक्ष में जनमत तैयार किया था। पीले सियार ने कवि और लेखक की, नीले सियार ने पत्रकार की और हरे सियार ने धर्मगुरु की भूमिकाएँ निभाई थीं।


(iii) भेड़ों को यह विश्वास हो गया था कि भेड़िया अब संत बन गया है। वह शाकाहारी बन चुका है। उसका हृदय-परिवर्तन हो गया है। यदि भेड़िया चुनाव में जीता तो वह भेड़ों के हितों की रक्षा के लिए कार्य करेगा और उनके विजयी होने पर भेड़ निर्भय होकर जीवन बिता सकेंगी।
भेड़ें अत्यंत ही नेक, ईमानदार, कोमल, विनयी, दयालु और निर्दोष थीं और वे भ्रष्ट सियारों की बातों में आकर भेड़ियों को अपना शुभचिन्तक तथा हितरक्षक मानने लगी थीं।

(iv) सियार समाज के स्वार्थी और अवसरवादी भ्रष्ट चापलूस लोगों के प्रतीक हैं। ऐसे लोग शोषक वर्ग की दया पर पलते हैं और उनके हर अनैतिक और गलत कार्यों में उनका साथ देते हैं। बूढ़ा सियार भी भेड़िये द्‌वारा फेंकी गई हड्‌डियों को चूस-चूसकर खाता था। इन लोगों की स्वार्थपरता इन्हें मानवता-विरोधी बना देती है। भेड़िये के जीतने पर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए ही सियारों ने चुनाव में उसका प्रचार किया था।


(2)
पशु-समाज में इस ’क्रांतिकारी’ परिवर्तन से हर्ष की लहर दौड़ गई कि सुख-समृद्‌धि और सुरक्षा का स्वर्ण-युग अब आया और वह आया।
प्रश्न

(i) पशु-समाज की खुशी का क्या कारण था ?

(ii) ’क्रांतिकारी’ से क्या तात्पर्य है ? यहाँ इस शब्द का प्रयोग किस संदर्भ में किया गया है ? समझाकर लिखिए।

(iii) चुनाव की घोषणा होते ही भेड़ियों ने क्या सोचा ? चुनाव के बाद भेड़ियों ने पंचायत में पहला कानून क्या बनाया  ?

(iv) प्रजातंत्र किसे कहते हैं ? भारतीय प्रजातंत्र में क्या खामियाँ हैं और इसका निवारण कैसे किया जा सकता है ? अपने शब्दों में उत्तर दीजिए।



उत्तर


(I) पशु समाज की खुशी का कारण यह था कि वन-प्रदेश में सभ्यता के विकास के उपरांत एक अच्छी शासन-व्यवस्था की स्थापना के लिए प्रजातांत्रिक सरकार के लिए चुनाव की आवश्यकता महसूस की गई।
(ii) ’क्रांतिकारी’ से तात्पर्य है - बदलाव लाने वाला। पशु-समाज ने अपने भविष्य को सँवारने के लिए तथा भय-मुक्त समाज का निर्माण करने के लिए वन-प्रदेश में अपने जन-प्रतिनिधियों को चुनने का निर्णय लिया।यह एक क्रांतिकारी परिवर्तन था जिससे पूरे वन-प्रदेश में खुशी की लहर चल पड़ी। भेड़ों ने सोचा कि अब उनका भय दूर हो जाएगा तथा शांति, बंधुत्व और सहयोग पर आधारित समाज की स्थापना हो पाएगी।
(iii) चुनाव की घोषणा होते ही भेड़ियों ने यह सोचा कि अब उनका संकटकाल आ गया है। वन-प्रदेश में भेड़ों की संख्या बहुत ज्यादा है इसलिए चुनाव के बाद पंचायत में उनका ही बहुमत होगा और वे अपने हि्तों की सुरक्षा के लिए कानून बनवाएँगे कि कोई पशु किसी को न मारे। ऐसी स्थिति में भेड़ियों को घास चरना सीखना पड़ेगा।
चुनाव के बाद पंचायत में भेड़िये प्रतिनिधि बनकर आए और उन्होंने भेड़ों के हितों की भलाई के लिए पहला कानून यह बनाया कि हर भेड़िये को सवेरे नाश्ते के लिए भेड़ का एक मुलायम बच्चा, दोपहर के भोजन में एक पूरी भेड़ और शाम को स्वास्थ्य के ख्याल से आधी भेड़ दी जाए।

(iv) प्रजातंत्र का मतलब होता है जनता द्वारा जनता का शासन ,प्रजातंत्र में सत्ता आम आदमी के हाथ में होती है क्योंकि जनता चुनाव के द्‌वारा अपने जन-प्रतिनिधियों को चुनकर संसद में भेजती है जहाँ वे सरकार का गठन करते हैं और जनहित के लिए कानूनों का निर्माण करते हैं।
पूरी दुनिया में प्रजातांत्रिक सरकार-व्यवस्था को ही सर्वोत्त्म माना गया है। भारत में भी प्रजातंत्र है लेकिन इसकी कुछ खामियाँ भी है जिसमें सबसे प्रथम है - अशिक्षा। भारत में शिक्षा की दर विश्व की तुलना में कम है जिसके कारण कुछ भ्रष्ट राजनीतिज्ञ अपने चापलूसों के प्रचार का सहारा लेकर अपने पक्ष में जनमत ( Public opinion) तैयार कर लेते हैं। ये नेतागण भोली-भाली मासूम जनता को झूठे स्वप्न दिखाकर उनका वोट प्राप्त कर लेते हैं और सरकार बनाकर सत्ता की ताकत का दुरुपयोग करते हैं।
बड़े घर की बेटी
प्रेमचंद
  (जन्म: 31 जुलाई, 1880 - 8अक्टूबर 1936)
प्रेमचंद का जन्म बनारस के निकट लमही नामक गाँव में हुआ था। इनका वास्तविक नाम धनपतराय था। हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद का स्थान महत्त्वपूर्ण है। प्रेमचंद के लेखन में गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव है जिसमें समता और भाईचारे पर आधारित  समाजवादी परिकल्पना भी निहित है। इन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। इन्होंने अपनी रचनाओं के द्‌वारा राष्ट्रीयता, किसान-मज़दूर, स्त्री-दलित और हिन्दुस्तानी भाषा को साहित्य का विषय बनाया। प्रेमचंद का सम्पूर्ण कथा-साहित्य मानसरोवर के आठ भागों में प्रकाशित है। प्रेमचंद ने साहित्यिक पत्रिका हंस और जागरण का संपादन कार्य भी किया। प्रेमचंद की भाषा में हिन्दी-उर्दू के सहज शब्दों का प्रयोग मिलता है। प्रेमचंद का साहित्य आदर्श से यथार्थ की ओर अग्रसर होता है।
प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ - पंच परमेश्वर, पूस की रात, बूढ़ी काकी, नशा, कफ़न, दो बैलों की कथा (कहानी) गबन, प्रेमाश्रम, सेवासदन, रंगभूमि, निर्मला, गोदान, कर्मभूमि (उपन्यास) आदि।

कठिन शब्दार्थ

सम्पन्न - परिपूर्ण
उद्‌योग - प्रयत्न
कांतिहीन - आभा या चमकहीन
प्रथा - रिवाज़
ललनाएँ - स्त्रियाँ
ढिठाई - ज़िद
हाथी मरा भी तो नौ लाख का - अच्छी हैसियत वाला व्यक्ति नुकसान उठा कर भी समर्थ बना रहता है
व्यंजन - खाद्‌य पदार्थ
किफ़ायत - बचत
बहुधा - अक्सर, प्राय:
पुरुषत्व - मरदानगी
कोप भवन - गुस्सा आने पर रहने का कमरा
भद्र - सभ्य
त्योरी चढ़ना - आँखें चढ़ना
अवाक - चकित
हृदय विदारक - दिल दहलाने वाली
सौगन्ध - कसम
भावज - भाभी
क्षुदा - भूख
पुलकित - प्रसन्न
मर्यादा - मान
पशुवत - जानवर की तरह
क्रोधाग्नि - गुस्से की आग
शऊर - सलीका, आचरण

(1)

श्रीकंठ इस अंग्रेजी डिग्री के अधिपति होने पर भी पाश्चात्य सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी न थे, बल्कि वे बहुधा बड़े ज़ोर से उनकी निंदा और तिरस्कार किया करते थे।
प्रश्न

(i) श्रीकंठ कौन थे ? उन्होंने कौन०सी अंग्रेजी डिग्री ली थी ? उसका उनके व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ा ?

(ii) सम्मिलित कुटुंब के संबंध में श्रीकंठ के विचार स्पष्ट कीजिए। उन विचारों का उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा ?

(iii) श्रीकंठ की किस विशेषता के कारण उनका विवाह आनंदी से हुआ ? उनकी पत्नी को उनका घर कैसा लगा ?

(iv) एक दिन दोपहर में कौन, क्या लाया ? आनंदी ने क्या किया ? समझाकर लिखिए।


उत्तर


(i) श्रीकंठ सिंह ठाकुर बेनीमाधव सिंह के बड़े पुत्र और आनंदी के पति थे। प्रारंभ से ही उनका रुझान पढ़ाई की ओर था। उन्होंने रात-दिन कठोर परिश्रम करके बी०ए० की डिग्री प्राप्त की थी, जिसके कारण उनका शरीर निर्बल तथा चेहरा कांतिहीन हो गया। बी०ए० पास करने के बाद उन्हें एक दफ्तर में नौकरी मिल गई। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात भी वे पाश्चात्य सामाजिक प्रथाओं के विशेष प्रेमी नहीं थे। उनके अंदर भारतीय संस्कारों के प्रति अत्यधिक लगाव था।

(ii) श्रीकंठ सिंह जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए संयुक्त परिवार को सहायक मानते थे। उनके अनुसार हमें सम्मिलित परिवार में रहना चाहिए। अधिकतर स्त्रियाँ आजकल संयुक्त परिवार में मिल-जुलकर रहना पसंद नहीं करती हैं। पर ऐसा करना जाति तथा देश दोनों के लिए हानिकारक होता है। परिवार में साथ-साथ रहने से एकता की भावना बढ़ती है। संयुक्त परिवार में त्याग, प्रेम, सुख-दुख में साथ देने, मिल-जुलकर कार्य  करने की भावना बढ़ती है जिससे मनुष्य में जातीय गुणों का विकास होता है और देश-प्रेम की भावना भी जागृत होती है।


(iii) श्रीकंठ एक बार भूपसिंह के पास चंदा माँगने गए थे। उनके अच्छे स्वभाव के कारण भूपसिंह उन पर रीझ गए। उन्होंने सोचा कि ऐसे अच्छे स्वभाव के व्यक्ति के साथ उनकी सुंदर और गुणी कन्या सुखी रह सकेगी। अत: उन्होंने अपनी चौथी बेटी आनंदी का विवाह श्रीकंठ के साथ बड़ी धूम-धाम से करा दिया।
आनंदी बड़े घर की लड़की थी। उसके घर में विलासिता के सभी सामान थे। जब वह नए घर में आई तो वहाँ की स्थिति उसके मायके से अलग थी। वह एक सीधा-सादा देहाती घर था पर आनंदी ने थोड़े ही दिनों में स्वयं को इन नई परिस्थिति के अनुकूल ढाल लिया। यह भारतीय नारी का मुख्य गुण है कि वह ससुराल में वहीं के अनुसार अपने स्वभाव और गुणों को परिवर्तित कर परिस्थिति से समझौता करना सीख लेती है।

(iv) एक दिन दोपहर में लालबिहारी सिंह दो चिड़ियाँ लेकर आया और अपनी भाभी आनंदी से उसे जल्दी पकाने को कहा क्योंकि उसे भूख लगी थी।
जब लालबिहारी सिंह घर आया तब आनंदी भोजन बना चुकी थी और वह उसकी राह देख रही थी। लेकिन फिर वह नया व्यंजन बनाने बैठी। बड़े घर की बेटी होने के कारण वह बचत करना नहीं जानती थी। घी पाव भर से अधिक नहीं था, इसलिए उसने सब घी डालकर मांस बनाया।


(2)
बेटा, बुद्‌धिमान लोग मूर्खों की बात पर ध्यान नहीं देते। वह बेसमझ लड़का है। उससे जो भूल हुई तुम बड़े होकर क्षमा करो।
प्रश्न

(i) वक्ता कौन है ? उसका परिचय दीजिए।

(ii) वक्ता ने किससे क्या निवेदन किया और क्यों ?

(iii) आनंदी का चरित्र-चित्रण करते हुए बताइए कि वह पति से देवर की शिकायत करने पर क्यों पछता रही है ?

(iv) "बड़े घर की बेटी" के माध्यम से प्रेमचंद ने संयुक्त परिवार में अपनी आस्था व्यक्त की है - स्पष्ट कीजिए।
उत्तर


(i) वक्ता बेनीमाधव सिंह हैं। वे गौरीपुर गाँव के जमींदार और नंबरदार थे। वे एक आदर्श पिता एवं समझदार व्यक्ति थे परंतु स्त्रियों से अधिक पुरुषों को श्रेष्ठ समझते थे। वह संयुक्त परिवार के पोषक थे। उनके दो पुत्र थे - श्रीकंठ सिंह और लालबिहारी सिंह।

(ii) बेनीमाधव सिंह ने अपने बड़े पुत्र श्रीकंठ से निवेदन किया कि वह अपने छोटे भाई लालबिहारी सिंह की गलती को क्षमा कर दे क्योंकि उन्होंने देखा कि गाँव के कुछ लोग किसी न किसी बहाने उनके घर के झगड़े का आनंद लेने के लिए वहाँ आकर बैठ गए थे। लालबिहारी सिंह ने क्रोध में आकर अपनी भाभी आनंदी पर खड़ाऊँ उठाकर फेंका था जिससे आनंदी की ऊँगली में काफी चोट आ गई थी। इसी बात को लेकर श्रीकंठ अपने छोटे भाई से बेहद नाराज़ थे।

(iii) कहानी की नायिका आनंदी एक सुंदर व समझदार तथा धनी परिवार की रूपवती एवं गुणवती कन्या है। वह मिलनसार, हर परिस्थिति में मिल-जुलकर रहने वाली, मृदुभाषी और परिश्रमी युवती है। अपने ससुराल के सभी सदस्यों से प्रेम एवं श्रद्‌धा रखती है।
पति श्रीकंठ से देवर लालबिहारी की शिकायत करने पर वह मन ही मन पछता रही है क्योंकि वह नहीं जानती है कि बात इतनी बढ़ जाएगी और श्रीकंठ क्रोध में आकर घर छोड़ने या लालबिहारी को निकालने की बात करेंगे। वह नहीं चाहती थी कि संयुक्त परिवार टूट जाए।
(iv) परिवार समाज की सबसे छोटी इकाई है और एक व्यक्ति से ही आदर्श परिवार बनता है। भारतीय सामाजिक परम्परा संयुक्त परिवार को महत्त्व देती है और उसे बनाए रखने में यकीन करती है। संयुक्त परिवार में प्रत्येक सदस्य का सामूहिक विकास संभव है। यदि परिवार में ही मिल-जुलकर नहीं रहा जा सकता तो समाज में एकता कैसे स्थापित होगी।
प्रस्तुत कहानी में आनंदी का विवाह एक संयुक्त परिवार में होता है। वह अपने देवर लालबिहारी के द्‌वारा अपमानित होती है लेकिन श्रीकंठ द्‌वारा संयुक्त परिवार को तोड़ने की बात पर उसे रोकती है। आनंदी लालबिहारी को क्षमा कर परिवार में फिर से एकता स्थापित करती है।

बात अठन्नी की
सुदर्शन (बदरीनाथ)
 

सुदर्शन (1895-1967) प्रेमचन्द परम्परा के कहानीकार हैं। इनका दृष्टिकोण सुधारवादी है। ये आदर्शोन्मुख यथार्थवादी हैं। मुंशी प्रेमचंद और उपेन्द्रनाथ अश्क की तरह सुदर्शन हिन्दी और उर्दू में लिखते रहे हैं। अपनी प्रायः सभी प्रसिद‌ध कहानियों में इन्होंने समस्यायों का आदशर्वादी समाधान प्रस्तुत किया है।
सुदर्शन की भाषा सरल, स्वाभाविक, प्रभावोत्पादक और मुहावरेदार है। इनका असली नाम बदरीनाथ है।
लाहौर की उर्दू पत्रिका हज़ार दास्ताँ में उनकी अनेक कहानियाँ छपीं।  उन्हें गद्य और पद्य दोनों ही में महारत थी। "हार की जीत" पंडित जी की पहली कहानी है और 1920 में सरस्वती में प्रकाशित हुई थी।
इन्होंने अनेकों फिल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे हैं।  फिल्म धूप-छाँव (१९३५) के प्रसिद‌ध गीत तेरी गठरी में लागा चोर,‍ उन्ही के लिखे हुए हैं।

कठिन शब्दार्थ
वेतन - आय
मैत्री - मित्रता
सौगंध - कसम
पेशगी - अग्रिम ( पहले) दिया जाने वाला धन
बटोरना - इकट्‌ठा करना
तनख्वाह - वेतन
गुज़ारा - निर्वाह
निर्दयता - क्रूरता
आँखों में खून उतर आना - बहुत क्रोध आना
रंग उड़ना - घबरा जाना
आँखें भर आना - दया आना
लातों के भूत बातों से नहीं मानते - दुष्ट व्यक्ति पर समझाअने-बुझाने का प्रभाव नहीं पड़ता


(1)
अभी सच और झूठ का पता चल जाएगा। अब सारी बात हलवाई के सामने ही कहना।
प्रश्न
(i) प्रस्तुत वाक्य का वक्ता कौन है ? श्रोता का परिचय दीजिए।
(ii) "अभी सच और झूठ का पता चल जाएगा" बाबू जी के इस कथन के
       पीछे छिपे संदर्भ को स्पष्ट रूप में लिखिए।
(iii) बाबू जगतसिंह कौन थे ? उन्होंने रसीला से ऐसा क्या कहा जो उसके
       चेहरे का रंग उड़ गया ? रसीला की प्रतिक्रिया भी लिखिए।
(iv) रसीला के झूठ बोलने का पता चलने पर बाबू जगतसिंह ने रसीला के
       साथ कैसा व्यवहार किया ? उनका व्यवहार आपको कैसा लगा ?
       समझाकर लिखिए।

उत्तर


(i) प्रस्तुत वाक्य के वक्ता बाबू जगतसिंह हैं। श्रोता रसीला इनके यहाँ नौकरी करता है। वह एक ईमानदार, सीधा व स्वामिभक्त नौकर था। वह सोचता था कि बाबू जी उस पर बहुत विश्वास करते हैं। अत: कम तनख्वाह होने पर भी किसी दूसरे के यहाँ जाकर नौकरी नहीं करना चाहता था। उसके बूढ़े पिता, पत्नी और तीन बच्चे गाँव में रहते थे। वह अपनी सारी तनख्वाह गाँव भेज दिया करता था।

 

(ii) बाबू जी ने रसीला से पाँच रुपए की मिठाई मँगवाई थी। रसीला बहुत ईमानदार था। उसने रमज़ान से कुछ रुपए उधार लिए थे जिसमें से केवल आठ आने देने बाकी थे। उस दिन रसीला साढ़े चार रुपए की मिठाई लाया और आठ आने रमज़ान को देकर अपना कर्ज़ चुका दिया। बाबू जी मिठाई देखते ही पहचान गए कि यह कम है और रसीला ने हेरा-फेरी की है। इसलिए वह हलवाई के पास जाकर सच व झूठ का पता लगाना चाहते थे।


(iii) बाबू जगतसिंह इंजीनियर थे और रसीला उनके यहाँ काम करता था। एक बार पाँच रुपए की मिठाई मँगवाने पर रसीला साढ़े चार रुपए की मिठाई लाया। उसने आठ आने रमज़ान को दिए जो उसके कर्ज़ के बचे हुए थे। बाबू जगतसिंह मिठाई देखते ही चौंक गए थे। उन्होंने जैसे ही रसीला से पूछा कि क्या यह मिठाई पाँच रुपए की है ? रसीला के चेहरे का रंग उड़ गया। वह बहुत डर गया था। उसने आखिर में सच कह दिया कि उससे गलती हो गई है।



(iv) रसीला के झूठ बोलने पर बाबू जगतसिंह बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने उसके गाल पर तमाचा मारा। हलवाई के पास चलने को कहा। रसीला के द्‌वारा गलती स्वीकार करने पर भी जगतसिंह ने रसीला को माफ़ नहीं किया। वह उसे थाने ले गए, वहाँ सिपाही को पाँच रुपए देकर रसीला से सच उगलवाने के लिए कहा। जगतसिंह ने सिपाही से यह भी कहा कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
बाबू जगतसिंह का अपने नौकर के प्रति ऐसा व्यवहार अत्यंत अनुचित है। वह उसकी पहली गलती है जिसे माफ़ किया जा सकता था। उसने मज़बूरी में आकर सिर्फ आठ आने की ही हेरा-फेरी की थी।
 
(2)
"यह इंसाफ नहीं अंधेर है। सिर्फ़ एक अठन्नी की ही तो बात थी।" रात के समय जब हज़ार पाँच सौ के चोर नरम गद्‌दों पर मीठी नींद ले रहे थे तो अठन्नी का चोर जेल की तंग, अंधेरी कोठरी में पछता रहा है।
  
प्रश्न

(i) यह "इंसाफ नहीं अंधेर नगरी है।" यह कथन किसने कहा और वह        कौन-सा कार्य करता है?


(ii) अठन्नी की चोरी किसने की थी और क्यों?


(iii) शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए।


(iv) ऐसा क्या हुआ कि वक्ता ने दुनिया को अंधेर नगरी कहा? अपने शब्दों में लिखिए।

 
उत्तर
(i) 'यह इंसाफ नहीं अंधेर नगरी है' यह वाक्य रमजान ने कहा था। रमजान रसीला का मित्र था। वह शेख सलीमुद्‌दीन के यहाँ नौकरी करता था, वह चौकीदार था। शेख सलीमुद्‌दीन जिला मजिस्ट्रेट थे।

(ii) अठन्नी की चोरी रसीला ने की थी। उसने रमजान से उधार लिया था। वह अठन्नी रमजान को देकर कर्ज़मुक्त होना चाहता था।

(iii) 'बात अठन्नी की' कहानी का शीर्षक प्रतीकात्मक शीर्षक है। जब कहानी का शीर्षक किसी विशेष अर्थ की ओर इंगित करता है तब उस शीर्षक को प्रतीकात्मक कहते हैं।
'बात अठन्नी की'  कहानी समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की ओर इशारा करते हुए न्याय व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
प्रस्तुत कहानी में रसीला अपने मित्र रमजान का कर्ज़ चुकाने के लिए अपने मालिक बाबू जगत सिंह के दिए गए पाँच रुपए से  अठन्नी बचाकर अपने मित्र रमजान को दे देता है। रिश्वतखोर मालिक जगत सिंह ने रसीला को पाँच रुपए मिठाई लाने के लिए दिए थे और उन्होंने उसकी चोरी पकड़ ली। रसीला अपना अपराध स्वीकार कर लेता है। रसीला पर मुकदमा चला और रिश्वतखोर  शेख सलीमुद्‌दीन ने उसे छह महीने की सज़ा सुना दी। लेखक कहता है कि ''पाँच सौ के चोर नरम गद्‌दों पर मीठी नींद ले रहे थे, और अठन्नी का चोर जेल की तंग, अंधेरी कोठरी में पछता रहा था''अत: कहानी का शीर्षक सटीक है।

(iv) रमजान ने दुनिया को अंधेर नगरी कहा क्योंकि उसके मित्र गरीब रसीला को मात्र अठन्नी की चोरी के अपराध में छह महीने की सज़ा सुनाई गई थी जबकि उसने अपना अपराध इंजीनियर बाबू जगत सिंह के सामने स्वीकार कर लिया था। रमजान  इस बात से अवगत था कि शेख सलीमुद्‌दीन तथा बाबू जगत सिंह दोनों ही रिश्वत लेते हैं लेकिन देश का कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता क्योंकि वे समाज के बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। जिस अदालत में रसीला को छह महीने की सज़ा सुनाई गई उस अदालत में शेख सलीमुद्‌दीन ही न्यायधीश की कुर्सी पर विराजमान थे।


 
संदेह
जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1889 - 14 जनवरी 1937) हिन्दी कवि, नाटकार, कथाकार, उपन्यासकार तथा निबन्धकार थे। वे हिन्दी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की। प्रसाद जी की प्रारंभिक शिक्षा काशी मे क्वींस कालेज में हुई, किंतु बाद में घर पर इनकी शिक्षा का व्यापक प्रबंध किया गया, जहाँ उन्होंने संस्कृत, हिंदी, उर्दू, तथा फारसी का अध्ययन किया।
प्रसाद की रचनाओं में प्रेम, सौन्दर्य, देशभक्ति व प्रकृति-चित्रण का वर्णन मिलता है। उनकी आस्था भारतीय संस्कृति एवं मानवतावाद में रही है। वे राष्ट्रीय भावना तथा स्वदेश प्रेम को अधिक महत्त्व देते हैं।
प्रसाद की भाषा में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
प्रमुख रचनाएँ - चित्राधार, झरना, लहर, प्रेम-पथिक, आँसू, कामायनी, तितली, कंकाल, चंद्रगुप्त, अजातशत्रु आदि।

शब्दार्थ

उज्ज्वल - चमकीला
आलोक खंड - रोशनी का हिस्सा
प्रतिमा - मूर्ति
निर्झरिणी - झरना
प्रतिबिम्ब - छाया
वैधव्य - विधवापन
अवलंब - सहारा
संखिया - एक प्रकार का ज़हर
दुर्वह - जिसे संभालना मुश्किल हो
मृग मरीचिका - आधारहीन भ्रम, छलावा
बजरा - छत वाली नाव
दुश्चरित्रा - बुरे चरित्र वाली
विक्षिप्त - पागल
निश्वास - लम्बी साँस छोड़ना

(1)

उसके हाथों में था एक कागजों का बंडल, जिसे सन्दूक में रखने से पहले वह खोलना चाहता था। पढ़ने की इच्छा थी, फिर भी न जाने क्यों हिचक रहा था और अपने को मना रहा था जैसे किसी भयानक वस्तु से बचने के लिए कोई बालक को रोकता हो।
 
प्रश्न
 
(i) किस के हाथों में क्या था ? यह किसने भेजा था ? स्पष्ट कीजिए।
(ii) मनोरमा कौन थी ? रामनिहाल को वह कहाँ मिली थी ? समझाकर लिखिए।

(iii) मनोरमा ने रामनिहाल को वे पत्र किसलिए लिखे थे ? पढ़ने की इच्छा होने पर भी रामनिहाल बंडल को क्यों नहीं खोल पाया ?
 
(iv) संदेह कहानी का उद्‌देश्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर

(i) रामनिहाल के हाथों में एक कागज़ का बंडल था। वास्तव में ये कागज़ मात्र कागज़ नहीं थे बल्कि मनोरमा के पत्र थे। मनोरमा रामनिहाल को अपना हितैषी समझती थी।

 
(ii) मनोरमा पटना निवासी मोहन बाबू की पत्नी थी। वे ब्रजकिशोर के संबंधी थे तथा उनके यहाँ आए हुए थे। रामनिहाल ब्रजकिशोर के यहाँ काम करता था तथा कामकाज से छुट्‌टी पाकर कार्तिक पूर्णिमा को संध्या की शोभा देखने के लिए गंगा किनारे दशाश्वमेघ घाट जाने के लिए तैयार था।
उस समय ब्रजकिशोर ने रामनिहाल से मोहन बाबू तथा उनकी पत्नी मनोरमा को साथ ले जाने के लिए कहा क्योंकि उनके पास समय नहीं था। इस प्रकार रामनिहाल की मनोरमा से मुलाकात हुई थी।


(iii) मनोरमा एक अत्यंत सुंदर स्त्री थी तथा अपने पति मोहन बाबू से उसका वैचारिक मतभेद है इसलिए वह परेशान सी रहती है। वह जानती है कि ब्रजकिशोर उसके पति को अदालत से पागल घोषित करवाने की चेष्टा कर रहे हैं ताकि उनकी संपत्ति के प्रबंधक बना दिए जाएँ। मनोरमा चाहती थी कि रामनिहाल इस संकट से उसे बचाए इसलिए उसने रामनिहाल को पत्र लिखा।
रामनिहाल मनोरमा द्‌वारा लिखे गए पत्र को पढ़ने की इच्छा होने के बावज़ूद भी नहीं खोलना चाह रहा था। वह श्यामा से मन ही मन प्रेम करता था और साथ ही उसके मन में मनोरमा के लिए भी कोमल भाव उत्पन्न होने लगे थे। वह भ्रम की स्थिति में था कि क्या करे, क्योंकि मनोरमा की सहायता करने के लिए उसे श्यामा का घर छोड़कर जाना पड़ेगा। अत: रामनिहाल का मन दुविधा की स्थिति में था।

 


(iv) जयशंकर प्रसाद द्‌वारा रचित संदेह  एक मनोवैज्ञानिक  कहानी है जिसके माध्यम से लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि संदेह या भ्रम का शिकार व्यक्ति मानसिक और भावनात्मक पीड़ा का शिकार होता है। उसमें भटकन की प्रवृत्ति बढ़ जाती है और उसका स्वभाव अत्यंत आत्मकेंद्रित तथा सोच संकुचित हो जाती है। कहानी में मोहन बाबू अपनी पत्नी मनोरमा पर संदेह करते हैं जिसकी वजह से वह विक्षिप्त सा व्यवहार करने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ मनोरमा रामनिहाल से सहायता माँगती है और रामनिहाल को भ्रम हो जाता है कि मनोरमा उसके प्रति आकर्षित हो चुकी है किन्तु वह विधवा श्यामा से भी प्रेम करता है। रामनिहाल की यह असमंजस की स्थिति उसे मानसिक पीड़ा पहुँचाती है। अत: व्यक्ति को अपने विवेक का इस्तेमाल कर हर तरह के संदेह से उबरने की कोशिश करनी चाहिए।

(2)

ओह! संसार की विश्वासघात की ठोकरों ने मेरे हृदय को विक्षिप्त बना दिया है। मुझे उससे विमुख कर दिया है। किसी ने भी मेरे मानसिक विप्लवों में मुझे सहायता नहीं दी। मैं ही सबके लिए मरा करूँ। यह अब मैं नहीं सह सकता । मुझे अकपट प्यार की आवश्यकता है। जीवन में वह कभी नहीं मिला!
प्रश्न
 
(i) वक्ता के इस कथन में हमें किस बात की झलक मिल रही है ? वह किससे अपनी बात कहना चाहते हैं ?

(ii) "मानसिक विप्लवों" से क्या तात्पर्य है ? ये हमें क्या नुकसान पहुँचा सकते हैं? वक्ता के संदर्भ में बताइए।
(iii) मोहन बाबू का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताइए कि उन्हें किस पर संदेह था और क्यों ?

(iv) कहानी के आधार पर मनोरमा का चरित्र-चित्रण कीजिए।

उत्तर

(i) वक्ता मोहन बाबू के इस कथन से हमें उनकी मन:स्थिति के बारे में पता चल रहा है। उनके साथ अनेक लोगों ने विश्वासघात किया है जिससे वे सभी को अविश्वास की दृष्टि से देखने लगे हैं। वे मानसिक विक्षिप्तता के शिकार हो गए हैं। वे  अपनी बातें मनोरमा से कहना चाहते हैं जो उनकी पत्नी है।

 
(ii) "मानसिक विप्लवों" से  तात्पर्य है - मन में उठने वाली हलचल या उथल-पुथल। जीवन में वही व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है जिसका मन स्थिर हो लेकिन जिस व्यक्ति का मन अस्थिर या अशांत हो, उसकी सफलता में सदैव संदेह बना रहता है। मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्ति अन्य लोगों पर विश्वास नहीं कर पाता है और जल्दी ही उत्तेजित होकर अपनी वाणी और विचारों का संतुलन खो देता है। संदेह कहानी में मोहन बाबू का मन भी अशांत और विक्षिप्त है। वे मानसिक रूप से अत्यंत कमज़ोर हैं। वे अपनी पत्नी मनोरमा पर शक करते हैं और मानसिक पीड़ा सहते हैं।


(iii) मोहन बाबू मनोरमा के पति हैं। वे अत्यंत संवेदनशील व्यक्ति हैं। वे साहित्यिक प्रवृत्ति के भी हैं। गंगा में दीपदान का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह जीवन के लघुदीप को अनंत की धारा में बहा देने का संकेत है। वे अकपट प्यार के इच्छुक हैं पर मानसिक रूप से बहुत कमज़ोर हैं। मोहन बाबू को अपने रिश्तेदार ब्रजकिशोर और पन्ती मनोरमा पर संदेह था। उन्हें विश्वास हो गया था कि ब्रजकिशोर उनकी पत्नी के साथ मिलकर उनकी संपत्ति के प्रबंधक बनने के लिए उन्हें अदालत में पागल सिद्‌ध करना चाहते हैं।
 


(iv) मनोरमा एक अत्यंत सुंदर महिला तथा मोहन बाबू की पत्नी है। वैचारिक स्तर पर उसका अपने पति मोहन बाबू से मतभेद रहता है। उसे इस बात का आभास है कि ब्रजकिशोर उसके पति को पागल बनाकर उसकी सारी सम्पत्ति हड़पने की योजना बना रहे हैं। वह बुरे चरित्र वाली स्त्री नहीं है। वह चाहती है कि उसके पति की मनोदशा ठीक हो जाए। वह चाहती है कि उसके पति के मन में ब्रजकिशोर को लेकर जो भी संदेह है, वह दूर हो जाए। वह रामनिहाल से सहायता भी माँगती है।
महायज्ञ का पुरस्कार
जशपाल जैन

(1912 - 2000)

यशपाल जैन का जन्म 1 सितम्बर 1912 को विजयगढ़ ज़िला अलीगढ़ में हुआ था। सस्ता साहित्य मंडल के प्रकाशन के पीछे मुख्यत: आप ही का परिश्रम था। आपने सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन के मंत्री के रूप में हिंदी की सेवा की । आपने अनेक उपन्यास, कहानी संग्रह, एक आत्मकथा, तीन प्रकाशित नाटक, कविता संग्रह, यात्रा वृत्तांत, संग्रहों का प्रकाशन व संपादन किया।
इनकी रचनाओं में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों को गंभीरता से उभारा गया है।
यशपाल की भाषा अत्यंत व्यावहारिक है जिसमें आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया गया है।

1990 में आपको  पद्‌मश्री से सम्मानित किया गया था। 

10 अक्टूबर 2000 को नागदा (म. प्र) में आपका निधन हो गया।
कठिन शब्दार्थ
पौ फटना - सूर्योदय
आद्‌योपांत - शुरू से अंत तक
कोस - लगभग दो मील के बराबर नाप
तहखाना - ज़मीन के नीचे बना कमरा
प्रथा - रिवाज़
बेबस - विवश
धर्मपरायण - धर्म का पालन करने वाला
विस्मित - हैरान
कृतज्ञता - उपकार मानना
उल्लसित - प्रसन्न
विपदग्रस्त - मुसीबत में फँसे

(1)
उन दिनों एक कथा प्रचलित थी। यज्ञों के फल का क्रय-विक्रय हुआ करता था। छोटा-बड़ा जैसा यज्ञ होता, उनके अनुसार मूल्य मिल जाता। जब बहुत तंगी हुई तो एक दिन सेठानी ने कहा, "न हो तो एक यज्ञ ही बेच डालो!"

प्रश्न

(i) उन दिनों क्या प्रथा प्रचलित थी?

(ii) सेठानी ने एक यज्ञ बेचने का सुझाव क्यों दिया?
(iii) भूखे कुत्ते को रोटियाँ खिलाने को सेठ ने महायज्ञ क्यों नहीं माना?
(iv) कहानी के अनुसार महायज्ञ क्या था? इसके बदले में सेठ को क्या मिला?

उत्तर

(i) उन दिनों यज्ञों के फल के क्रय-विक्रय की प्रथा प्रचलित थी।

 
(ii) सेठ बहुत धनी थे। वे अत्यंत विनम्र और उदार भी थे। उनका मन धार्मिक कार्यों में लगता था। उन्होंने अपने घर का भंडार - द्‌वार सबके लिए खोल दिया था। उनके द्‌वार पर जो भी हाथ पसारे आता खाली हाथ नहीं जाता। सेठ ने बहुत से यज्ञ किए और दान में बहुत सारा धन दीन-दुखियों में बाँट दिया। अकस्मात्‌ दिन फिरे और सेठ अत्यंत गरीब हो गए और भूखों मरने की नौबत आ गई। गरीबी से परेशान होकर सेठ की पत्नी ने सेठ को एक यज्ञ बेचने का सुझाव दिया।

(iii) सेठ अत्यंत उदार प्रवृत्ति के थे। गरीब होने पर भी उन्होंने अपने कर्त्तव्य को सदैव सर्वोपरि माना और उसी के अनुरूप आचरण दिखाया। स्वयं भूखे रहकर भी एक भूखे कुत्ते को अपनी चारों रोटियाँ खिला दीं। धन्ना सेठ की त्रिलोक-ज्ञाता पत्नी ने सेठ के इस कृत्य को महाज्ञय की संज्ञा दी, तो सेठ ने इसे केवल कर्त्तव्य-भावना का नाम दिया। सेठ का मानना था कि भूखे कुत्ते को रोटी खिलाना मानवोचित कर्त्तव्य है।

(iv) कहानी के अनुसार लेखक का मानना है कि अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए धन-दौलत लुटाकर किया गया यज्ञ, वास्तविक यज्ञ नहीं हो सकता बल्कि नि:स्वार्थ और निष्काम भाव से किया गया कर्म ही सच्चा महायज्ञ कहलाता है। स्वयं कष्ट सहकर दूसरों की सहायता करना ही मानव-धर्म है।  सेठ ने भूखे कुत्ते को रोटी खिलाना अपना मानवीय कर्म समझा न कि महायज्ञ। उन्होंने अपने कर्म को मानवीय-कर्त्तव्य समझा और उसे धन्ना सेठ को नहीं बेचा।
ईश्वर की कृपा-दृष्टि से सेठ को अपने घर में एक तहखाने में हीरे-जवाहरात मिले। यह सेठ के महायज्ञ का पुरस्कार था।
(2)
   
“    ओ सेठ! स्वयं भूखे रहकर, अपना कर्त्तव्य मानकर प्रसन्नचित्त   तुमने मरणासन्न कुत्ते को चारों रोटियाँ खिलाकर उसकी जान
  बचाई, उस महायज्ञ का यह पुरस्कार है।
                           
 
 
 


 
 
 

8 टिप्‍पणियां:

  1. ये तो एक ख़जाना मिल गया !!!
    मेरी ख़ुशी को धन्यवाद शब्द समेट नहीं पाएगा !!!

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  2. kal meri 10 vi ki exam hai mere bohot kaam ka aaya ab to 90 mil hi jayenge

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    1. Icse Helpline 101 se aaye ho kya?Wahan is website ke bare me maine dala...mera bhi parso exam h

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    2. धन्यवाद
      मैं एक शिक्षक हूँ और पिछले १४ वर्षों से हिन्दी पढ़ाने की कोशिश कर रहा हूँ। यदि मेरा यह प्रयास आपलोगों को पसंद आया है तो इसके लिए मैं आप सबका धन्यवाद देता हूँ।

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    3. bhai logo yeh to ekdum faadu hain . apan ko sab hindi ab samajh me aa gaya

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