गद्‌य संकलन








पुत्र-प्रेम
प्रेमचंद
(1880 - 1936)

हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद का स्थान महत्त्वपूर्ण है। प्रेमचंद के लेखन पर गाँधीवादी विचारधारा का प्रभाव है। इन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। इन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा राष्ट्रीयता, किसान-मजदूर, स्त्री-दलित और हिन्दुस्तानी भाषा को साहित्य का विषय बनाया। प्रेमचंद का सम्पूर्ण कथा-साहित्य मानसरोवर के आठ भाग में प्रकाशित है। प्रेमचंद ने साहित्यिक पत्रिका हंस और जागरण का संपादन-कार्य भी किया। प्रेमचंद की भाषा में हिन्दी-उर्दू के आसान शब्दों का प्रयोग मिलता है जिसे हिन्दुस्तानी भाषा भी कहा जा सकता है। प्रेमचंद  का साहित्य आदर्श से यथार्थ की ओर अग्रसर होता है।

प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएँ हैं-पंच परमेश्वर, पूस की रात, दो बैलों की
                                          कथा,नशा,परीक्षा (कहानी)
                                          गबन, प्रेमाश्रम,रंगभूमि, निर्मला, सेवासदन,
                                          गोदान, कर्मभूमि (उपन्यास)।


पुत्र-प्रेम

प्रेमचंद द्‌वारा रचित प्रसिद्‌ध कहानी पुत्र-प्रेम एक पिता की हृदयहीनता और संवेदनहीनता का अत्यंत मार्मिक चित्रांकन करता है। भारतीय समाज में परिवार का विशेष महत्त्व है। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल रहते हैं और कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी मज़बूती के साथ एक-दूसरे का साथ देते हैं लेकिन जिस परिवार में सदस्य एक-दूसरे से भावानात्मक रूप से नहीं जुड़े होते हैं उस परिवार का भविष्य सदैव अंधकारमय होता है। प्रस्तुत कहानी में पिता चैतन्यदास अपने बीमार और मृतप्राय बेटे प्रभुदास का इलाज इटली के किसी सेनेटोरियम में ले जाकर सिर्फ़ इसलिए नहीं करवाना चाहते क्योंकि इसके लिए उन्हें लगभग तीन हजार रुपए खर्च करने पड़ते और यह निश्चित भी नहीं था कि प्रभुदास ट्‌युबरक्युलासिस (तपेदिक) की बीमारी से पूरी तरह ठीक भी हो जाएगा। एक पिता होने के नाते चैतन्यदास को ,जो अपने क्षेत्र के जाने-माने वकील भी थे, उन्हें अपने पुत्र को बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए थी।

कठिन शब्दार्थ
तसकीन - तसल्ली
ज़ेरदारी - परेशानी
नागवार - अप्रिय
नैराश्य - निराशा से भरे
शर - तीर, बाण
पथ्यापथ्य - रोग की अवस्था में हितकर तथा अहितकर वस्तुएँ
ठीकरे - मिट्‌टी के बर्तन के टूटे टुकड़े
दग्धकारी - जलाने वाली या दुख पहुँचाने वाली

क्या निराश हुआ जाए?

हजारी प्रसाद द्‌विवेदी

(1907 - 1979)
हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का हिंदी निबंध और आलोचनात्मक क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान है। वे उच्च कोटि के निबंधकार और सफल आलोचक हैं।
उनके पिता पं॰ अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में ही हुई और वहीं से उन्होंने मिडिल की परीक्षा पास की। इसके पश्चात् उन्होंने इंटर की परीक्षा और ज्योतिष विषय लेकर आचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की। शिक्षा प्राप्ति के पश्चात द्विवेदी जी शांति निकेतन चले गए और कई वर्षों तक वहां हिंदी विभाग में कार्य करते रहे। शांति-निकेतन में रवींद्रनाथ ठाकुर तथा आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रभाव से साहित्य का गहन अध्ययन और उसकी रचना प्रारंभ की।
द्विवेदी जी का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली और उनका स्वभाव बड़ा सरल और उदार था। वे हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और बांग्ला भाषाओं के विद्वान थे। भक्तिकालीन साहित्य का उन्हें अच्छा ज्ञान था। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि देकर उनका विशेष सम्मान किया था।
द्‌विवेदी जी ने भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहास पर गहन विवेचन किया है। उन्होंने सूर, कबीर, तुलसी आदि पर जो विद्वत्तापूर्ण आलोचनाएँ लिखी हैं, वे हिंदी में पहले नहीं लिखी गईं। उनका निबंध-साहित्य हिंदी की स्थायी निधि है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी को साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में अपने उत्कृष्ट कार्य के लिए सन १९५७ में पद्‌म भूषण से सम्मानित किया गया।
द्विवेदी जी की भाषा परिमार्जित खड़ी बोली है। उन्होंने भाव और विषय के अनुसार भाषा का चयनित प्रयोग किया है।

प्रमुख रचनाएँ -

आलोचना/साहित्‍य-इतिहास




  • सूर साहित्‍य (1936)
  • हिन्‍दी साहित्‍य की भूमिका (1940)
  • प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद (1940)
  • कबीर (1942)
  • नाथ संप्रदाय (1950)
  • हिन्‍दी साहित्‍य का आदिकाल (1952)
  • आधुनिक हिन्‍दी साहित्‍य पर विचार (1949)
  • साहित्‍य का मर्म (1949)
  • मेघदूत: एक पुरानी कहानी (1957)
  • लालित्‍य मीमांसा (1962)
  • साहित्‍य सहचर (1965)
  • कालिदास की लालित्‍य योजना (1967)
  • मध्‍यकालीन बोध का स्‍वरूप (1970)

  • उपन्‍यास


    कठिन शब्दार्थ
    भ्रष्टाचार - भ्रष्ट आचरण
    फ़रेब - धोखा, छल
    आस्था - विश्वास
    निकृष्ट - नीच, अधम
    पर्दाफ़ाश - भेद प्रकट करना
    गांभीर्य - गंभीरता
    मनीषी - विद्‌वान
    आलोड़ित - मथा हुआ
    गंतव्य - मंज़िल, लक्ष्य
    निषेध - मना करना
    त्रुटि - भूल, चूक, कमी
    रूढ़िग्रस्त - परंपरागत बातों को मानकर चलने वाला
    विनम्र - सुशील, झुका हुआ
    अवांछित - जिसकी इच्छा न हो, अनचाहा
    वंचना - धोखा देना, ठगना
    प्रत्यारोप - आरोप के बदले लगाया गया आरोप
    गह्‌वर - गुफ़ा
    ऊहापोह - अनिश्चय की स्थिति में मन में उत्पन्न होने वाला तर्क-वितर्क



    [क्या निराश हुआ जाए? - पर एक विडीओ]


    दासी 
    जयशंकर प्रसाद
    ( 1890  -  1937)




    महाकवि के रूप में सुविख्यात जयशंकर प्रसाद (१८८९-१९३७) हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।
    छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक जयशंकर प्रसाद का जन्म ३० जनवरी १८९० को प्रसिद्‌ध नगर वाराणसी में एक व्यासायिक परिवार में हुआ था ।आपके पिता देवी प्रसाद तंबाकू और सुंघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार सुंघनी साहू के नाम से प्रसिद्‌ध था। आपकी प्रारम्भिक् शिक्षा आठवीं तक हुई किंतु घर पर संस्कृत, अंग्रेज़ी, पालि, प्राकृत भाषाओं का गहन अध्ययन किया। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय कर इन ‍विषयों पर एकाधिकार प्राप्त किया।

    एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात जयशंकर प्रसाद के तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अपूर्व ऊँचाइयाँ हैं।
    काव्य साहित्य में कामायनी बेजोड कृति है । 
    इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारत के प्राचीन ऐतिहासिक गौरव को वर्तमान के साथ जोड़कर अपने महान साहित्यकार होने का कर्त्तव्य निभाया।
    जयशंकर प्रसाद ने ४८ वर्षों के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ लिख कर हिंदी साहित्य जगत को सँवारा सजाया । १४ जनवरी १९३७ को वाराणसी में जयशंकर प्रसाद का निधन, हिंदी साहित्याकास में एक अपूर्णीय क्षति है ।
    प्रसाद की भाषा सहज, स्वाभाविक तथा भाव-प्रधान है जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों की बहुलता है।

    प्रमुख रचनाएँ -

      (काव्य)







    प्रेम पथिक


     (कहानी)

      

     (नाटक)
     कठिन शब्दार्थ

    झुँझलाकर - खीझकर
    अल्हड़पन - मनमौजीपन, दुनियादारी की समझ न होना
    पुष्ट - मज़बूत, मोटा-ताजा, बलवान
    बाला - किशोरी
    बेगाने - पराए
    कंगाल - गरीब
    आनंदातिरेक - अत्यधिक खुशी से
    उन्मत्त - पागल, नशे में
    उत्कंठा भरी आँखें - चाह से भरी आँखें
    शोषण - स्वार्थ सिद्‌धि के लिए अन्य व्यक्ति का उपयोग
    रंगरलियाँ - खुशियाँ मनाना
    स्निग्धता - मधुरता, कोमलता
    शुभ्र - सफ़ेद, श्वेत
    हृदय-रंजन प्रभात - मन को प्रसन्न करने वाला सवेरा
    पंकिल - कीचड़ से सनी हुई, मैली
    प्राचीर - चहारदीवारी
    आरक्त - लाल
    घृत - घी
    प्रणत - झुका हुआ
    कौशेय वसन - रेशमी वस्त्र
    वाग्दत्ता - जिसकी सगाई हो गई हो
    वह्‌निवेदी - अग्निवेदी
    परिणय - विवाह
    आततायी - उपद्रवी, अत्याचारी
    म्लेच्छ - नीच, पापी
    चतुष्पथ - चौराहा
    विवर्ण -  कांतिहीन, चमकहीन
    बणिक - बनिया
    प्रत्यावर्तन करना - लौटना, वापस जाना
    वारुणी विलसित नेत्र - नशीले आँखें



    गौरी


    सुभद्रा कुमारी चौहान

    (जन्म: 1904 -  मृत्यु: 1948)


    सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दी की सुप्रसिद्‌ध कवयित्री और लेखिका थीं। उनकी सुप्रसिद्‌धि  झाँसी की रानी कविता के कारण है। ये राष्ट्रीय चेतना की एक सजग कवयित्री रही हैं, किन्तु इन्होंने स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनाएँ सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को कहानी में भी व्यक्त किया। इनकी भाषा सेहज  तथा काव्यात्मक है, इस कारण इनकी रचना की सादगी हृदयग्राही है। इन्होंने अपनी भाषा में खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया है।
    प्रमुख रचनाएँ - 'बिखरे मोती' उनका पहला कहानी संग्रह है। इसमें भग्नावशेष, होली, पापीपेट, मंझलीरानी, परिवर्तन, दृष्टिकोण, कदम के फूल, किस्मत, मछुये की बेटी, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, अनुरोध, व ग्रामीणा कुल १५ कहानियां हैं।
    मुकुल और त्रिधारा (कविता-संग्रह)

    कठिन शब्दार्थ

    क्षोभ - व्याकुलता, रोष
    तन्मय - मग्न
    इंगित - इशारा
    पूनो - पूर्णिमा
    आडम्बर - दिखावा
    उत्सर्ग - त्याग
    कोटिश: - असंख्य, करोड़ों
    पग धूलि - पाँव की धूल
    यथेष्ट - जितना चाहिए उतना
    धाय - छोटे बच्चों की देखभाल करने वाली स्त्री
    नंदन कानन - स्वर्ग में स्थित इंद्र का उपवन

    इंटरव्यू


    अमरकांत
    (जन्म: 1 जुलाई 1925 - निधन: 17 फरवरी  2014)

    अमरकांत का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में नगारा गाँव में हुआ था। अमरकांत ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। इन्होंने हिन्दी साहित्य में कहानी, उपन्यास, संस्मरण तथा बाल साहित्य, अनेक विधाओं में लेखन कार्य किया। उन्होंने 'इंटरव्यू` नामक अपनी पहली कहानी लिखी और आगरा के प्रगतिशील लेखक संघ की मीटिंग में उसे डॉ. रामविलास शर्मा और अन्य सदस्यों को सुनाया।
    अमरकांत समाजवादी विचारों से जुड़े थे अत: उन्हें यह बात बहुत खुशी देती थी कि नेहरू जी भी समाजवादी हैं। समाजवाद, गांधीवाद और ऐसे ही कई अन्य विचारों को साथ लेकर अमरकांत आगे बढ़ रहे थे जिसकी झलक उनकी कहानियों में स्पष्ट दिखती है।

    इन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए -  सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त  शिखर पुरस्कार, यशपाल पुरस्कार, साहित्य अकादमी सम्मान, ज्ञानपीठ पुरस्कार, संस्थान पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा), महात्मा गांधी सम्मान (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा)

    प्रमुख रचनाएँ - सूखा पत्ता, ज़िन्दगी और जोंक, देश के लोग, बापू का फ़ैसला, खूँटों में दाल है, मौत का नगर, मित्र मिलन, कुहासा तूफान, वानर सेना, मँगरी, सच्चा दोस्त आदि।

    कठिन शब्दार्थ
    पंचमेल भीड़ - मिली-जुली भीड़
    निद्‌र्वन्द्‌व - संशयहीन
    आगन्तुक - आने वाला
    कूपमंडूक - मुएँ का मेंढक ( सीमित ज्ञान वाला)
    प्रलाप - अनाप-शनाप बात
    दिवालिया - जिसके पास ऋण चुकाने के लिए धन न बचा हो
    भाव भंगिमा - हाव-भाव
    आमूल - जड़ से
    अनभिज्ञता - अज्ञान

    मजबूरी
    मन्नू भंडारी
    ( जन्म: 3 अप्रैल, 1931)
    मन्नू भंडारी हिन्दी की सुप्रसिद्‌ध कहानीकार हैं। मध्य प्रदेश में मंदसौर जिले के भानपुरा गाँव में जन्मी मन्नू का बचपन का नाम महेंद्र कुमारी था। लेखन के लिए उन्होंने मन्नू नाम का चुनाव किया। उन्होंने एम.ए. तक शिक्षा पाई और वर्षों तक दिल्ली के मिरांडा हाउस में अध्यापिका रहीं। धर्मयुग में धारावाहिक रूप से प्रकाशित उपन्यास आपका बंटी से लोकप्रियता प्राप्त करने वाली मन्नू भंडारी विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में प्रेमचंद सृजनपीठ की अध्यक्षा भी रहीं।
    इन्हें हिन्दी अकादमी दिल्ली के शिखर सम्मान, राजस्थान संगीत अकादमी के व्यास सम्मान आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।
    इन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया और समाज की सड़ी-गली परम्पराओं के तले दबी नारी को आवाज़ दी। मन्नू की नारी न देवी है, न दानवी बल्कि हाड़ माँस की मानवी है।
    मन्नू भंडारी की भाषा संस्कृतनिष्ठ मुहावरेदार हिन्दी है जिसमें तत्सम शब्दों की बाहुल्य है। भाषा पात्रानुकूल तथा प्रभावोत्पादक है।
    प्रमुख रचनाएँ - एक प्लेट सैलाब, मैं हार गई, तीन निगाहों की तस्वीर, यही सच है, दस प्रतिनिधि कहानियाँ, श्रेष्ठ कहानियाँ, त्रिशंकु आदि ( कहानी संग्रह)
    एक इंच मुस्कान, आपका बंटी, महाभोज, स्वामी, कलवा आदि (उपन्यास)
    कठिन शब्दार्थ
    गठिया - जोड़ों का दर्द
    खड़िया - एक प्रकार की मिट्‍टी
    रोमांचित - पुलकित
    औषधालय - दवाखाना
    उपेक्षित - जिसकी ओर ध्यान न दिया जाए
    परिहास - हँसी मज़ाक
    साध - इच्छा
    नौन राई करना - नमक राई से नज़र उतारना
    याददाश्त - स्मरण शक्ति
    प्रयाण करना - प्रस्थान करना
    चिरायु - लम्बी आयु
    बौरा गया - पागल हो गया
    सामंजस्य - समानता
    हूबहू - ठीक वैसा ही
    ढर्रा - तरीका
    कलेजे पर गरम सलाख दागना - दुख पहुँचाना
    थाती - अमानत
    रवैया - ढंग
    भरसक - पूरी तरह
    दर्दीले - दर्द भरे
    सती
    शिवानी
    (जन्म- 17 अक्टूबर 1923 -  मृत्यु- 21 मार्च 2003)
    शिवानी हिन्दी की एक प्रसिद्‌ध उपन्यासकार हैं। इनका वास्तविक नाम गौरा पन्त था किन्तु ये शिवानी नाम से लेखन करती थीं। इनका जन्म १७ अक्टूबर 1923 को विजयदशमी के दिन राजकोट, गुजरात मे हुआ था। इनकी शिक्षा शन्तिनिकेतन और कलकत्ता विश्वविद्‌यालय में हुई। साठ और सत्तर के दशक में, इनकी लिखी कहानि्याँ और उपन्यास हिन्दी पाठकों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय हुए और आज भी लोग उन्हें बहुत चाव से पढ़ते हैं।शिवानी का कार्यक्षेत्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कुमाऊँ क्षेत्र की निवासी के रूप में बीता।  लखनऊ से निकलने वाले पत्र ‘स्वतन्त्र भारत’ के लिए ‘शिवानी’ ने वर्षों तक एक चर्चित स्तम्भ ‘वातायन’ भी लिखा।
    शिवानी की कहानियों में पर्वतीय समाज से संबंधित समस्याओं, प्रथाओ तथा मनोभावों का चित्रण हुआ है। इन्होंने अपनी रचनाओं में सामाजिक-आर्थिक समस्याओं से संघर्ष करती हुई नारी को प्रस्तुत किया है।
    इनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग किया गया है।
    1982 में शिवानी जी को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से अलंकृत किया गया।
    इनकी प्रमुख रचनाएँ हैं -विष कन्या, करिए छिमा, लालहवेली, अपराधिनी, चार दिन आदि (कहानी संग्रह)
    चौदह फेरे, श्मशान चम्पा, भैरवी, कैंजा, कृष्णकली, मायापुरी,आकाश आदि (उपन्यास)
    कठिन शब्दार्थ
    नासिका गर्जन - खर्राटे
    अवज्ञापूर्ण - उपेक्षापूर्ण
    उपालम्भ - शिकायत
    उपादेयता - उपयोगिता
    पर्याप्त - काफ़ी
    अबीरी - लाल रंग का
    लावण्य - सलोनापन, सुन्दरता
    रीतापन - खालीपन
    विस्थापित - हटाया गया
    अग्रणी - सबसे आगे
    स्वल्पभाषिणी - कम बोलने वाली
    सिद्‌धकलम - लिखने में निपुणता
    वर्तलाकार - गोल
    गतयौवन - जिसकी जवानी बीत चुकी हो, अधेड़ उम्र की
    वैधव्य - विधवापन
    सती - पति की मृत देह के साथ स्वेच्छा से चिता में जल जाने वाली स्त्री
    कदली स्तम्भ - केले के वृक्ष का तना
    भुवन मोहिनी - संसार को मोहनेवाली
    घृत - घी
    अद्‌र्धविक्षिप्त - आधा पागल
    कुकुरमुत्ता - मशरूम


    शरणागत



    वृंदावन लाल वर्मा
    (09 जनवरी, 1889 - 23 फरवरी, 1969)
    वृंदावनलाल वर्मा  हिन्दी के नाटककार तथा उपन्यासकार थे। हिन्दी उपन्यास के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है। वे प्रेमचंद-परम्परा के लेखक हैं। इतिहास, कला, पुरातत्व, मनोविज्ञान, मूर्तिकला और चित्रकला में भी इनकी विशेष रुचि रही। उन्होंने अधिकांश रचनाएँ ऐतिहासिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर लिखी हैं।  'अपनी कहानी' में आपने अपने संघर्षमय जीवन की गाथा कही है। बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने कानून की पढ़ाई की और झाँसी में वकालत करने लगे। 1909 ई० में 'सेनापति ऊदल' नामक नाटक छपा जिसे तत्कालीन सरकार ने जब्त कर लिया।
     भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्‌मभूषण से अलंकृत किया गया। इनकी भाषा अत्यंत सहज तथा पात्रानुकूल है जिसमें आंचलिक शब्दों का प्रयोग किया गया है।

    प्रमुख रचनाएँ - लगन, संगम, प्रत्यागत, मृगनयनी, दबे पाँव, मेढ़क का
                            ब्याह, अम्बपुर के अमर वीर, अँगूठी का दान, शरणागत
                            आदि।

    शब्दार्थ
    भोर - सुबह
    आगंतुक - मेहमान
    सरोकार - वास्ता
    शामत - आफ़त, मुसीबत
    मुकर्रर - निश्चित
    पेशा - व्यवसाय
    ढोर - पशु, मवेशी
    नफ़ा - फायदा, लाभ
    पौर - ड्‌योढ़ी
    वार्तालाप - बातचीत
    पेशगी - अग्रिम दी जाने वाली धनराशि
    सेंत-मेंत - फिज़ूल

    संस्कृति है क्या

    रामधारी सिंह "दिनकर"

    (जन्म: 23 सितंबर 1908 - निधन: 24 अप्रैल 1974)




    रामधारी सिंह 'दिनकर' हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार हैं। वे आधुनिक युग के  श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रान्त के बेगुसराय जिले का सिमरिया घाट उनकी जन्मस्थली है। उन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। उन्होंने संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था।

    'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से जाने गए। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति है। उन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता और शोषण के खिलाफ कविताओं की रचना की।

    उनकी पुस्तक संस्कृति के चार अध्याय  के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा उर्वशी के लिये भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। भारत सरकार ने इन्हें पद्‌म भूषण से सम्मानित किया।

    प्रमुख रचनाएँ - कुरुक्षेत्र, रेणुका, हुंकार, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा    

                            आदि।




    शब्दार्थ
    मद - अहंकार
    गढ़ना - बनाना, निर्मित करना
    वास करना - रहना
    मत्सर - द्‌वेष, क्रोध
    महीन - बारीक
    खोह - गुफ़ा
    हद - सीमा
    विकार - दोष
    समन्वय - मेल
    रूढ़ियाँ - पुरानी या परंपरागत बातें


    आउट साइडर

    मालती जोशी

    (जन्म: 4 जून, 1934)

    हिन्दी लेखक मालती जोशी का जन्म 4 जून 1943 को औरंगाबाद में हुआ था। आपने आगरा विश्वविद्यालय से वर्ष 1956 में हिन्दी विषय से एम.ए. की शिक्षा ग्रहण की। अब तक अनगिनत कहानियां, बाल कथायें व उपन्यास प्रकाशित कर चुकी हैं। इनमें से अनेक रचनाओं का विभिन्न भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी किया जा चुका है। कई कहानियों का रंगमंचन रेडियो व दूर दर्शन पर नाट्य रूपान्तर भी प्रस्तुत किया जा चुका है।   मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वर्ष 1998 के भवभूति अलंकरण सम्मान से विभूषित किया जा चुका है। मालती जोशी जी कि कहानियां मन को छूने वाली होती हैं।भाषा शैली अत्यंत रोचक, व्यावहारिक एवं सहज है।
    प्रमुख रचनाएँ :- अपने आँगन की छाँव, परख, जीने की राह दर्द का रिश्ता, वो तेरा घर, ये मेरा घर,रहिमन धागा प्रेम का, परख इत्यादि हैं
     अपनी कहानियों के बारे में, मालती जोशी कहती हैं -
    "जीवन की छोटी-छोटी अनुभूतियों को, स्मरणीय क्षणों को मैं अपनी कहानियों में पिरोती रही हूँ। ये अनुभूतियाँ कभी मेरी अपनी होती हैं कभी मेरे अपनों की। अपने आसपास बिखरे जगत का सुख-दु:ख उसी का सुख-दु:ख हो जाता है। और शायद इसीलिये मेरी अधिकांश कहानियां "मैं” के साथ शुरू होती हैं।"




    शब्दार्थ

    कुशल - राज़ी खुशी

    मुलतवी - स्थगित

    इत्मीनान - तसल्ली

    ब्योरा - वर्णन             

    दिलेर - हिम्मतवाला

    साबुत - समूचा

    त्रस्त - दुखी

    नियति - भाग्य
    दुराशा - व्यर्थ की आशा
    अनब्याही - अविवाहित
    रिहाई - मुक्ति
    निजात पाना - छुटकारा पाना
    दर्प - घमंड
    कृतार्थ - एहसान मानना
    बचकानी - बच्चों जैसी हरकत
    दायरा - कार्य क्षेत्र
    मोहलत - दिया गया समय
    निहायत - बहुत अधिक
    गनीमत - संतोषजनक 
    क्षीण - कमज़ोर
    व्यग्र - बेचैन
    मसरूफ़ - व्यस्त 
    प्रपंच - छल , फरेब
    जायज़ा लेना - अनुमान लगाना
    प्रतिवाद - विरोध      
    निढाल - अत्यंत थका हुआ  
     
    भक्तिन
    महादेवी वर्मा

    हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं। वे हिन्दी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है।
    उन्होंने अध्यापन से अपने कार्यजीवन की शुरुआत की और अंतिम समय तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्या बनी रहीं। प्रतिभावान कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत में निपुण होने के साथ-साथ  कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं। उन्हें हिन्दी साहित्य के सभी महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव प्राप्त है। महादेवी वर्मा ने अपनी रचनाओं के द्वारा स्त्री-सुधार पर विशेष ध्यान दिया।
    इनकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों की अधिकता है।
    प्रमुख रचनाएँ - नीहार, नीरजा, रश्मि, यामा, दीप-शिखा, अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, सोना, गिल्लू, घीसा आदि।

    शब्दार्थ
    जिज्ञासु - उत्सुक
    स्पद्‌र्धा - मुकाबला
    गोपालिका - अहीर की स्त्री
    दुर्वह - असहनीय, भारी
    किंवदन्ती - प्रचलित जनश्रुति
    मरणांतक रोग - असाध्य रोग
    अप्रत्याशित - जिसकी आशा न हो
    बिछोह - वियोग
    विधात्री - माता
    मचिया - एक व्यक्ति के बैठने लायक चारपाई, चौकी
    अभिषिक्त - स्थापित
    अलगौझा - बँटवारा
    कटिबद्‌ध - तत्पर
    जिठौत - पति के बड़े भाई का बेटा
    आग्नेय नेत्रों से - क्रोधित आँखों से
    वीतराग - अनासक्त
    दुर्लंघ्य - जो लाँघी न जा सके
    कलाबत्तू - एक तरह की मिठाई
    लपसी - पतला हलवा
    नापित - नाई
    गोंदरा - बिस्तर, गद्‌दा

        

    5 टिप्‍पणियां:

    1. उत्तर
      1. मैंने जयशंकर प्रसाद की कहानी "दासी" पर लिखित सामग्री अपलोड कर दी है...विलंब के लिए क्षमा चाहूँगा।

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    2. Dear Sir, 'BHAKTIN' kahaani ke lekhak parichay aur shabdarth blog par nahi hai.

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